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महाकाल मंदिर की कृपा से हैदराबाद में हुआ था प्लेग खत्म

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आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है बोनाली 

हैदराबाद. अभी उज्जैन में भगवान महाकाल की शाही सवारी प्रति सोमवार को निकल रही है तो वहीं आषाढ़ महीने में तेलंगाना राज्य भगवान महाकाल मंदिर की कृपा से लगभग206 साल पहले राज्य में प्लेग की महामारी समाप्त होने के कारण आज भी बोनाली त्यौहार मनाता है। इस त्यौहार में महाकाल मंदिर में विराजित  के देवी महाकाल की पूजा की जाती है। यह महाकाल मंदिर का तेलंगाना के साथ एक अनूठा रिश्ता है।

 बताया जाता है कि 1813 में हैदराबाद की एक बटालियन की तैनाती उज्जैन में हुई थी। उसी समय तेलंगाना के दो शहरों हैदराबाद और सिकंदराबाद में प्लेग की भीषण महामारी फैली जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई।  यह खबर जब बटालियन के सैनिकों को मिली तो वे बहुत दुखी हुए और उन्होंने महाकाल मंदिर स्थित महाकाली देवी के सामने प्रार्थना की कि वे हैदराबाद और सिकंदराबाद मैं प्लेग का खात्मा करें और ऐसा करने पर वे महाकाली का मंदिर तेलंगाना में बनाएंगे।

कहा जाता है कि इसके बाद हैदराबाद और सिकंदराबाद में प्लेग समाप्त हो गया और बटालियन ने तेलंगाना लौटकर गोलकुंडा किले में महाकाली की प्रतिमा स्थापित की। तभी से यह त्यौहार मनाया जा रहा है। तेलंगाना में मान्यता है कि आषाढ़ के मौसम में महाकाली अपने घर लौटती हैं । इसी के चलते आषाढ़ की शुरुआत के साथ ही तेलंगाना में इस त्यौहार का आयोजन प्रारंभ हो जाता है। आषाढ़ के पहले रविवार को यह त्यौहार गोलकुंडा किले स्थित महाकाली मंदिर में मनाया जाता है। दूसरे रविवार को बलगमपेट यल्लम्मा मंदिर में तथा तीसरे रविवार को सिकंदराबाद के उज्जैनी महाकाली मंदिर में मनाया जाता है।

  इस त्यौहार में भक्त पैदल यात्रा के रूप में मंदिर जाते हैं और महाकाली माता के चरणों में जल अर्पित करते हैं। यादव और मुख्य रूप से महिलाओं का है और वे चावल से बने बहुत सारे भोजन का मां महाकाली को भोग लगाती हैं। वे तांबे के घड़े सिर पर रखकर मंदिर पहुंचती हैं तथा मंदिर में चढ़ाए गए भोग को परिवारजनों और रिश्तेदारों में बांटा जाता है। इस त्यौहार में कागज के बने हुए थोटालू जो कि हमारे यहां निकलने वाले ढोल की तरह होते हैं भी निकाले जाते हैं।

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