अभी गरीब सवर्णों के लिए 50.5 प्रतिशत मौके हैं नौकरियों और शिक्षा में जो कि आरक्षण के बाद घटकर केवल 10 प्रतिशत बचेंगे

इंदौर. लोक सभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों यानी कि आठ लाख रुपए प्रतिवर्ष तक आय वाले गरीबों को नौकरियों और शिक्षा में दस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास किया है। हालांकि इसके लिए अभी उन्हें संविधान संशोधन भी करना होंगे। क्योंकि हमारे संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है। इसके सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास प्रतिशत तय कर रखी है। लेकिन इसके अलावा इस मामले में कुछ और समस्याएं भी हैं जो कि सवर्ण युवाओं के सामने आने वाली हैं। जिसके चलते वे शायद ही इसका लाभ लें।

मोदी सरकार का ये चुनावी दाव कहा जा रहा है लेकिन उन्हें इसका कोई लाभ मिलेगा इसकी संभावना कम ही हैं। क्योंकि ये आरक्षण सवर्ण युवाओं की दुविधा ही बढ़ाएगा। इसके समझने के लिए आरक्षण का वर्तमान स्वरुप समझना जरुरी है। फिलहाल हमारे देश में एससी, एसटी व अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलाकर 49.5 प्रतिशत आरक्षण हैं यानी की दूसरे शब्दों में 50.5 प्रतिशत सीटें सवर्णों के लिए उपलब्ध हैं। पहले ये सीटें अनारक्षित थीं लेकिन अब इन्हें न्यायालय के आदेश के बाद सामान्य कहा जाता है। पहले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के अधिक अंक आते थे तो वे अनारक्षित गिने जाते थे लेकिन कोर्ट ने इस मामले में निर्णय देते हुए कहा था कि जो आवेदक अपने आवेदन में स्वयं को जिस वर्ग में दर्शाता है वह उसी वर्ग में नौकरी या प्रवेश पाएगा। यानी कि कोर्ट के इस आदेश के बाद सवर्ण युवाओं के लिए 50.5 प्रतिशत सीटें उपलब्ध थीं। इस दस प्रतिशत आरक्षण के बाद आर्थिक रुप से कमजोर स्वर्ण के लिए नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में केवल यही दस प्रतिशत सीटें बचेंगी शेष 40.5 प्रतिशत सीटें उन सवर्णों के लिए  होंगी जो कि इस आरक्षण को नहीं मांगगे या इसकी सीमा में नहीं आएंगे। इस तरह से यह आरक्षण दरअसल आर्थिक रुप से कमजोर सवर्णो के लिए सुविधा की बजाय समस्या साबित होगा।

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