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कश्मीर का वह राज्यपाल जिसके टुकड़े करना चाहती थीं बेनज़ीर भुट्टो

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जगमोहन से थी पाकिस्तान को थी सबसे ज्यादा समस्या

पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्‌टो ने कहा था जगमोहन को भागमोहन कर देंगे

धारा 370 पर संसद के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के साथ ही अब ये इतिहास में जमा हो गई लेकिन जम्मू कश्मीर के मामले में राजनैतिक स्तर पर इतिहास खोदने का काम अब भी जारी है। इसी सिलसिले में धारा 370 हटाये जाने के विरोधी कश्मीर से पंडितों के पलायन के लिए 1990 में वहां के राज्यपाल बनाये गए जगमोहन के जिम्मेदार बताते हैं।

इतना ही नहीं जब जगमोहन को घाटी में दूसरी बार राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तो उस समय पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानंमंत्री बनजीर भुट्‌टो ने कहा था कि उन्हें भाग मोहन बना देंगे। इतना ही उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर देने की धमकी भी दी गई थी। कहा गया था कि जगमोहन को जग-जग, मो-मो, हन-हन बना देंगे यानी कि टुकड़ों में काट देंगे।

आपने सुना होगा कि गुरुवार को जम्मू पहुंचे कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने भी कश्मीर से पंडितों के पलायन का ठीकरा जगमोहन के सिर फोड़ा। इतना ही नहीं वामपंथी विचारधारा के समथर्क सोशल मीडिया  पर भी जगमोहन को कोस रहे हैं। ऐसे में यह जानना बहुत जरुरी है कि जगमोहन कौन हैं?

जगमोहन का पूरा नाम जगमोहन मल्होत्रा था और वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी थे। उनका सत्ता पर इतना प्रभाव था कि उन्हें 1971 में ही पद्म श्री से सम्मानित किया जा चुका था। भारतीय राजनीति में संजय गांधी के उभार के साथ ही जगमोहन उनके खास हो गए थे और इस तरह से वे इंदिरा गांधी के नजदीकी लोगों में भी शामिल थे। गांधी परिवार में उनका ये रुतबा राजीव गांधी के कार्यकाल में भी जारी रहा।

राजीव गांधी ने ही जगमोहन को पहलीबार जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बनाया था। वे 1984 से 1989 तक राज्यपाल रहे तथा इसके बाद उन्होंने राजीव गांधी और कांग्रेस का साथ पार्टी की कश्मीर नीति के चलते ही छोड़ा दिया और वे भाजपा के करीब हो गए थे। वीपी सिंह के देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद 1990 में जगमोहन को फिर से कश्मीर का राज्यपाल बनाया था। बताया जाता है कि वीपी सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन दे रही भाजपा की मांग पर उन्हें राज्यपाल बनाया गया था।

इसके पहले जगमोहन दिल्ली और गोवा के उपराज्यपाल भी रह चुके थे तथा राजीव गांधी की सरकार के समय उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया था। कांग्रेस राज में लगभग दो दशकों तक लूटियंस में जगमोहन का दबदबा बना रहा। कांग्रेस के साथ होते हुए भी जगमोहन कांग्रेस के विचार से कुछ अलग थे।

कटरा स्थित वैष्णों देवी मंदिर को सुरक्षित बनाने और उसे वर्तमान स्वरुप में लाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने इस मंदिर के आसपास विकास कार्य कराए थे। इसके अलावा फारुख अब्दुल्ला की सरकार को वर्खास्त भी उन्होंने ही किया था। फारुख अब्दुल्ला तब से ही जगमोहन के प्रखर आलोचक हैं।

फारुख अब्दुल्ला की जगह 1986 में जगमोहन के राज्यपाल रहते गुलाम मोहम्मद शाह मुख्यमंत्री बने थे। शाह ने मुख्यमंत्री बनने के लिए अब्दुल्लाह की पार्टी में तोड़फोड़ की थी। यह वह समय था जब की घाटी में अलगाववादी खुलम खुला पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे। शाह के नियंत्रण में कश्मीर की स्थिति नहीं थी।

खुद को बड़ा नेता साबित करने के लिए उन्होंने जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर शाह मस्जिद बनवाने का फैसला किया। इस पर लोगों ने प्रदर्शन किया तो, घाटी में इस्लाम खतरे में है का नारा दे दिया गया। इसके बाद से ही कश्मीरी पंडित, जो कि पहले से ही पाकिस्तान परस्त मुसलमानों के आंखों की किरकिरी बने हुए थे, सीधे निशाने पर आ गए और उन पर हमले होने लगे। दंगे भड़क गए और दंगे ना रोक पाने के चलते जगमोहन ने शाह की सरकार को भी बर्खास्त कर दिया। 

इसके बाद 1987 में जब घाटी में चुनाव हुए तो कट्टरपंथी नेता चुनाव हार गए। हारे हुए नेताओं ने पीछे से जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट बना लिया। इसके बाद भाजपा नेता पंडित टीकालाल टपलू की सरेआम हत्या कर दी गई। उनके बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या हुई और इस तरह से यह सिलसिला चल पड़ा। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इन हत्याओं में कोई भी गिरफ्तारियां नहीं हुई। हद तो तब हो गई जब श्रीनगर टेलीविजन केंद्र के निदेशक ल्हासा कौल की हत्या कर दी गई और इन्हीं घटनाओं के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किए गए। उधर जगमोहन का कार्यकाल समाप्त हो गया और उनकी जगह गिरीश चंद्र सक्सेना राज्यपाल बने।

असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान 

4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें. अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबारा छापा. चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित यहां से चले जाएं, नहीं तो बुरा होगा. इसके बाद लोग लगातार हत्यायें औऱ रेप करने लगे. कहते कि पंडितो, यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ – असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान (हमें पाकिस्तान चाहिए. पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ.) जनवरी 1990 में ही भारतीय जनता पार्टी के दबाव में जगमोहन को पुन: राज्यपाल बनाया गया। यह वह समय था जब घाटी में मस्जिदों से कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़कर चले जाने को कहा जा रहा था। स्थितियां नियंत्रण से बाहर थी ऐसे में जगमोहन ने घाटी से पंडितों को निकलने का रास्ता देना ही उचित समझा।

इन किस्से और हालात को यदि आपको गिफ्ट तरीके से जानना हो तो जगमोहन की पुस्तक My Frozen Turbulence in Kashmir  पढ़िए।  इसके बाद जगमोहन भाजपा में शामिल हुए और सांसद बने। इतना ही नहीं वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शहरी विकास मंत्री भी रहे। वे अभी 92 वर्ष के हैं और राजनीतिक चकाचौंध से दूर हैं। लेकिन कश्मीरी पंडित उन्हें कभी नहीं भूला सकेंगे और न कश्मीर।

1 thought on “कश्मीर का वह राज्यपाल जिसके टुकड़े करना चाहती थीं बेनज़ीर भुट्टो

  1. अच्छा मोदी जी ने तो किसी का जिक्र नही किया और कश्मीर में बदलाव की लहर ला दी

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