दावा किया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने नागा समझौते से तहत नागालैंड को अलग पासपोर्ट और अलग झंडे का अधिकार दे दिया है।

कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के बाद से ही सरकार के इस कदम के विरोधी लगातार एक प्रचार कर रहे हैं कि मोदी सरकार के एक विधान और एक निशान को लेकर दोहरे मापदंड हैं। जहां कश्मीर में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया लेकिन 2016 में मोदी के सरकारी निवास पर हुए नागा समझौते में नागालैंड के लिए अलग झंड़े और पासपोर्ट की मांग को स्वीकृति दे गई है।

इतना ही नहीं इससे आगे 14 अगस्त को नागालैंड का स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के फेडरल गर्वमेंट ऑफ नागालैंड के आदेश की प्रति भी सोशल मीडिया में वायरल होने लगी। हाल ये है कि भाजपा के समर्थक भी इस मुद्दे पर बात करने से बचते ही हैं क्योंकि उन्हें इस मामले में तथ्यों की सही जानकारी नहीं हैं। उनके लिए चिंता का सबब यह है कि वर्तमान नागा समझौता, जिसके आधार पर नागा उग्रवादी समूह नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN-IM) और भारत सरकार के बीच कुछ मामलों में सहमति बनी थी, उसे नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में उनके सरकारी निवास पर ही अंजाम दिया गया है।

ये समझौता अगस्त 2015 में हुआ था, लेकिन इसे गोपनीय रखा गया था। यह समझौता चर्चा में तब आया जबकि मणिपुर के एक अखबार इंफाल टाइम्स में नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN-IM) के गृह मंत्री आरएच रेजिंग के हवाले से खबर प्रकाशित की। इसमें रेजिंग ने कहा कि भारत सरकार के साथ जिस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर सहमति बनी है उसमें आठ बातें शामिल हैं। इनमें नागालैंड के लिए अलग संविधान, अलग झंडे तथा पासपोर्ट के साथ ही अगल करेंसी और सेना जैसी बातों के साथ ही नागालैंड को संयुक्त राष्ट्र में अलग देश के रुप में सदस्यता से जैसी बातें कही गई थीं।

यानी कि इस खबर को देखकर लगता है कि एक तरह से नागालैंड को अलग देश के रुप में मान्यता दे दी गई है।  इस तरह की खबर को जब गूगल पर सर्च किया जाता है तो इंफाल टाइम्स के साथ ही एक अन्य वेबसाइट ई पाओ पर भी इस तरह की खबर मिलती है लेकिन किसी भी राष्ट्रीय मीडिया में इस तरह की कोई खबर नहीं मिलती है। लेकिन सोशल मीडिया पर भाजपा के विरोधियों ने इंफाल टाइम्स की खबर को जमकर चलाया और भाजपा के राष्ट्रवाद को कटघरे में खड़ा किया।

2016 में कांग्रेस ने भी इस मामले में सवाल किया था कि प्रधानमंत्री मोदी को इस मामले में जवाब देना चाहिए कि क्या भारत सरकार ने नागालैंड के अलग झंड़े और अलग पासपोर्ट की मांग को मान लिया है। लेकिन सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद से इस मामले में संशय की स्थिति बन गई। उधर नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN-IM) के आईजक मुइवा ने कहा कि हमने नागा संप्रुभता का मुद्दा नहीं छोड़ा है। इससे इस मामले में अलग झंडे और पासपोर्ट का मामला सही प्रतीत होता है।

इसके बाद एक अन्य अंग्रेजी अखबार में भी जनवरी 2016 में इस बात की संभावना व्यक्त की गई कि भारत सरकार नागालैंड की अलग झंडे और पासपोर्ट की मांग स्वीकार कर सकती है। जब कांग्रेस नेता पी. चिदमबरम यह कहते हैं कि कश्मीर मुस्लिम बहुल है इसलिए विशेष दर्जा हटाया गया है तो वे अपरोक्ष रुप से नागालैंड की बात ही कर रहे होते हैं।

भारत सरकार की ओर से इस मामले में पहला प्रतिकार जून 2016 में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने किया। उन्होंने कहा कि नागालैंड के अलग झंडे और पासपोर्ट को लेकर जो कुछ कहा जा रहा है वो सही नहीं है।

Govt recognises unique Naga history & committed to it. Talks with NSCN-IM is going on. News of granting separate Flag & Passport is not true
— Kiren Rijiju (@KirenRijiju) June 22, 2016

इसके बाद एक बार एनसीपी के राज्यसभा सांसद डीपी त्रिपाठी ने इस बारे में राज्य सभा में इस संबंध में सवाल किया था इसका जवाब भी रिजिजु ने ही दिया था। रिजिजु ने कहा था कि यह मामला गोपनीय है इस संबंध में अभी जानकारी नहीं दी जा सकती है। इसके बाद पीआईबी ने एक विज्ञप्ति जारी की थी। इसमें और अधिक जानकारी देते हुए कहा गया है कि फिलहाल फ्रेमवर्क एग्रीमेंट हुआ है जिसके दायरे में अंतिम समजौता किया जाएगा। इसके चलते अभी इस मामले में जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है।
नागालैंड को अलग झंडे और पासपोर्ट का अधिकार केवल नागा समूह के साथ समझौते से ही नहीं मिल जाएगा। इस समझौते के बाद सरकार को इस संबंध में संसद में विधेयक भी लाना पड़ेगा। विधेयक के पारित होने के बाद ही नागालैंड को वह दर्जा मिल सकेगा जिसका दावा सोशल मीडिया में किया जा रहा है।

इस मामले में आप सही जानकारी के लिए संसद की वेबसाइट देखेंगे तो पाएंगे कि न तो अब तक संसद में इस तरह को कोई विधेयक पेश किया गया है और न ही इस तरह का कोई विधेयक वहां लंबित है। इसके अलावा भारत सरकार या नागालैंड की राज्य सरकार की अधिकारिक वेबसाइट पर इस बारे में कोई जानकारी मौजूद है ऐसे में सोशल मीडिया में जो कुछ इस बारे में चल रहा है वो गलत प्रतीत होता है और ऐसा लगता है कि इसे सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN-IM) और उसके द्वारा गठित फेडरल गर्वमेंट ऑफ नागालैंड की और से प्रायोजित किया गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *