हिंदू इलाकों में ज्यादा नाम छूटे मुस्लिम क्षेत्र में कम जबकि ज्यादा घुसपैठिए वहीं

गुवाहाटी.

असम में घुसपैठियों की पहचान करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर लाए गए नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजन्स (एनआरसी) का अंतिम रुप प्रकाशन हो गया है। लेकिन इसके साथ ही इसके पुर्नसत्यापन की मांग उठाई जाने लगी है। यहां तक कि इस मामले में न्यायालय में याचिका दायर करने वाला संगठन असम पब्लिक वर्क्स ने भी इसे दोषपूर्ण दस्तावेज बताया है। एनआरसी में 19 लाख लोगों को बाहरी मानते हुए उनके नाम इसमें शामिल नहीं किए गए हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने भी इस पर असंतोष जताया है। पार्टी का कहना है कि तीन सीमाई जिलों- करीमगंज, दक्षिण सलमारा और धुबरी- जहां मुस्लिम आबादी का प्रतिशत अधिक है, वहां से एनआरसी के मसौदे में छूटे लोगों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है। तुलना का पैमाना तिनसुकिया जैसे जिलों को बताया गया, जहां 88 फीसदी हिंदू आबादी है, वहां पर 13.25 प्रतिशत लोग एनआरसी से बाहर रखे गए हैं जबकि धुबरी (79.6%), करीमगंज (56%) और दक्षिण सलमारा (95%) मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं जबकि धुबरी, करीमगंज और दक्षिण सलमारा में यह आंकड़ा क्रमशः 8.26%, 7.67% और 7.22 प्रतिशत का है। प्रदेश सरकार में मंत्री चंद्रमोहन पटवारी ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि एनआरसी मसौदे में नाम छूटने की दर कार्बी आंगलांग (14.31 फीसदी) और तिनसुकिया (13.25 फीसदी) है, जहां असम के ‘भूमिपुत्र’ बरसों से रहते आए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार होजाई जिले में एक्सक्लूशन दर सबसे ज्यादा 32.99% है, वहीं सबसे कम एक्सक्लूशन- 1.62%- माजुली जिले में हुए हैं। प्रदेश भाजपा प्रमुख रंजीत दास का आरोप है कि मुस्लिम बहुल धुबरी और बारपेटा में कई लोगों ने एनआरसी में आने के लिए दस्तावेजों में हेरफेर की है। उनका कहना है कि इन जिलों में एनआरसी में अपनी पहचान बताने के लिए दिए गए जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज फर्जी हैं और एनआरसी पदाधिकारियों ने इन्हें सही से नहीं जांचा है, जिसके चलते ‘अवैध रूप से रह रहे विदेशियों’ के नाम एनआरसी में जुड़ गए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *