छोटे से राज्य के छात्रों ने दिखाया है कि छात्र राजनीति केवल जेएनयू और डीयू में नहीं होती

गौरव व्यास. देहरादून

एक छात्र नेता जिसने चुनाव न लड़ने का मौका मिलने पर अपने संगठन से बगावत की। उसे हराने के लिए पूरी सरकार ने मोर्चा संभाला, इतना ही नहीं चुनाव के दौरान उस पर हमला भी हुआ और सिर में आठ टांके लगे होने के बाद भी वो युवा छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव बड़े अंतर से जीतने में सफल रहा। छात्र राजनीति के यह रोचक दास्तान पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की है और चुनाव जीतने वाले इस युवा का नाम है निखिल शर्मा। अपने संगठन एबीवीपी से बगावत करके निखिल उस कॉलेज का चुनाव जीते जहां पर एबीवीपी पिछले 12 वर्षों से नहीं हारी थी।

देहरादून के शासकीय डीएवी पीजी कॉलेज के चुनाव के बारे में जब आप जानेंगे तो पता चलेगा कि छात्र राजनीति केवल जेएनयू या दिल्ली यूनिवर्सिटी में नहीं होती। इसके देश में और भी कई केंद्र है। बस स्थानीय मीडिया उन्हें बच्चों का चुनाव समझकर उपेक्षित कर देता है।

देहरादून के शासकीय पीजी कॉलेज में चुनाव की इबारत कुछ महीने पहले लिखी हुई थी जब एबीवीपी संगठन में दायित्व का वितरण हो रहा था। 9 साल से एबीवीपी का काम कर रहे हैं निखिल शर्मा को उम्मीद थी कि अबकी बार संगठन उन्हें कोई ठीक-ठाक दायित्व देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ समय बाद निखिल से कहा गया कि वह छात्र संघ चुनाव की तैयारियां करें। परिषद उन्हें चुनाव लड़वायेगी। निखिल चुनाव की तैयारियों में लग गए लेकिन बाद में जब छात्र संघ चुनाव की बारी आई तो परिषद ने निखिल की बजाए सागर तोमर को अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशी बना दिया। बताया जाता है कि तोमर को प्रत्याशी बनाने के पीछे राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थे। रावत और उनकी सरकार को यह एहसास भी नहीं था कि यह मामला इतने चुपचाप निपटने वाला नहीं है।

पहले से ही एबीवीपी में युवा मोर्चा के कैंपस में बढ़ते हस्तक्षेप तथा पदाधिकारियों की मनमानी को लेकर असंतोष बना हुआ था। इन परिस्थितियों से नाराज परिषद के पांच पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों ने मिलकर निखिल शर्मा को प्रत्याशी घोषित कर दिया और उन्होंने निर्दलीय फॉर्म भरा।

जिस तरह से एबीवीपी के प्रत्याशी तोमर की तरफ से देहरादून के सारे विधायक, पार्षद, दर्जा प्राप्त मंत्री और युवा मोर्चा अध्यक्ष और नेता मोर्चे पर लगाए गए, उससे यह लगने लगा था कि वाकई तोमर को प्रत्याशी बनवाने में रावत की रुचि है। हाल ये थे कि राज्य में अपनी सरकार होने के गुमान में इन लोगों ने बिना अनुमित तोमर के समर्थन में रैली निकाली। जिस पर पुलिस ने केस दर्ज किया।

इस बच्चों के चुनाव में सरकार की नाक बचाने में लगे बड़ों ने छात्र संघ चुनाव में आचार संहिता की खूब धज्जियां उड़ाई। एबीवीपी के प्रत्याशी की तरफ से बड़े-बड़े प्रिंटेड बैनर लगाए गए। उसके बाद भी लगा कि बागी प्रत्याशी जीत रहा है तो मारपीट हुई और खून बहा। बताया जाता है कि डीएवी पीजी कॉलेज के इतिहास में पहली बार मतदाताओं को घर से कॉलेज लाने के लिए गाड़ियां लगाई गई लेकिन इसके बाद भी केवल 46% मतदान हुआ। और जब परिणाम आए तो निखिल शर्मा 641 मतों से ज्यादा से चुनाव जीते वहीं सत्ता और संगठन के प्रत्याशी दूसरे नंबर पर भी नहीं आ सके। वे तीसरे नंबर पर आए। तोमर को शर्मा से आधे वोट ही मिले।

माहौल ऐसा रहा कि जीत कर पुलिस ने निखिल शर्मा को जुलूस नहीं निकालने दिया। उन्हें पुलिस सुरक्षा में घर पहुंचाया गया। शर्मा को डॉ. प्रवीण तोगड़िया की राष्ट्रीय छात्र परिषद का भी समर्थन मिला था।

उत्तराखंड के छात्र संघ चुनाव में एक और आयाम है। वो है यहां पर राष्ट्रीय स्तर के छात्र संगठनों से अलग स्थानीय संगठन भी हैं और ये संगठन कागजी नहीं हैं। इनमें हैं आर्यन, सत्यम शिवम छात्र संगठन। इसके अलावा भी संगठन हैं। लेकिन इन दोनों संगठनों ने एबीवीपी और एनएसयूआई की मौजूदगी के बाद भी डीएवी पीजी कॉलेज में एक-एक पदों के चुनाव जीतें हैं।

हिमालय की तलहटी में बसा छोटा से राज्य उत्तराखंड ने ये बताया है कि यहां के छात्र संघ चुनाव किसी भी तरह से जेएनयू और डीयू से कम नहीं हैं बल्कि कई मायनों में उससे आगे ही हैं। इन चुनाव ने खून खराबा, बगावत, सत्ता और पैसों दुरुपयोग जैसी नकारात्मक चीजों के साथ ही छात्रों की लोकतांत्रिक समझ और नकारा छात्र संगठनों को हाशिये पर डालने जैसे सकारात्मक संदेश भी दिए हैं।

ये ऐसा इकलौता राज्य है जहां पर मुख्यमंंत्री भी अपनी पंसंद के छात्र नेता को शासकीय कॉलेज का अध्यक्ष नहीं बनवा पाया। लेकिन दिल्ली जैसी मीडिया की मौजूदगी न होने के कारण आप और हम इन चुनाव के बारे में ज्यादा जान नहीं सके। इस तरह के छात्र संघ चुनाव से ही देश को और छात्रों को नेतृत्व मिल सकता है। इसी के चलते गूंज ने इस कहानी को आप के सामने लाने की कोशिश की है।

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