अपने मंत्री के खिलाफ कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ने वाले विधायक पर भाजपा ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की

राजनीति में जो न हो वो कम है। आज भारतीय जनता पार्टी बहुत मजबूत स्थिति में है और वो स्वयं को सबसे अनुशासित दल भी बताती है लेकिन इस पार्टी में एक ऐसा विधायक भी है जो कि 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ा और विधायक बना, वहीं भाजपा विधायक रहते हुए 2019 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा। खास बात यह है कि यह विधायक भाजपा के केंद्रीय मंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ा और आज भी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य है।

ये विधायक हैं उत्तर प्रदेश की मीरापुर विधानसभा के अवतार सिंह भड़ाना। भड़ाना पिछले पांच साल से हर चुनाव के पहले पार्टी बदल रहे हैं। वे भले ही उत्तर प्रदेश में विधायक हैं लेकिन उनकी राजनीतिक आत्मा हरियाणा में भटकती है। इसके चलते वे 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा की फरीदाबाद सीट से टिकट मांग रहे थे, लेकिन भाजपा ने मना कर दिया तो वे बिना देर किए प्रियंका गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल हो गए और फरीदाबाद से भाजपा प्रत्याशी और केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर के सामने खड़े हो गए। भड़ाना चुनाव हार गए लेकिन अब तक उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक हैं।

उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को त्यागपत्र भेज दिया था लेकिन इसे आज तक स्वीकार नहीं किया गया। क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष केवल वे त्यागपत्र ही स्वीकार करते हैं जो कि विधायक अपने हाथ से उन्हें सौंपते हैं। इस कारण से भड़ाना का इस्तीफा तो स्वीकार नहीं हुआ लेकिन भाजपा ने अपने मंत्री के विरुध्द चुनाव लड़ने वाले भड़ाना पर अब तक कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की है। वे आज भी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सदस्य हैं।

भड़ाना 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी से लड़े थे। चुनाव हारने के बाद वे हरियाणा विधानसभा चुनाव के पहले इंडियन नेशनल लोकदल में शामिल हो गए थे। लेकिन 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले वे चौटाला की लोकदल को छोड़कर भाजपा में न केवल शामिल हुए बल्कि मीरापुर विधानसभा से प्रत्याशी बना दिए गए। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले भड़ाना की राजनीतिक आत्मा फिर हरियाणा पहुंच गई। अभी वे फिर हरियाणा में ही जुगत जमा रहे हैं। भाजपा से बाहर नहीं हुए हैं तो कोशिश है कि इस बार हरियाणा में विधायक बन जाएं क्योंकि इनके यहां मंत्री बनने की संभावना ज्यादा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस दलबदलू नेता के सामने भाजपा का अनुशासन कहां चला गया है?

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