जानिए सनातन में क्या है कुत्तों का महत्व

राम राज्य की बात करने वाले राम को ही भूल कर बैठे हैं?

हाल ही में स्ट्रीट डॉग्स पर सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के बाद माहौल गर्म है। एक तरफ पशु प्रेमी है जो कि उन्हें बचाने के लिए कोशिश कर रहे हैं और दूसरी तरफ इन्हीं पशु प्रेमियों को निशाने पर लेने वाले लोग भी काम नहीं है। उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन राव भागवत, जिन्होंने स्वयं पशु चिकित्सा की पढ़ाई की है, ने भी सर्वोच्च न्यायालय के स्ट्रीट डॉग्स को शेल्टर होम में भेजने के निर्णय से असहमति जताई है और कहा है कि उनके लिए सबसे सही यही है कि उनकी नसबंदी करके रखा जाए इससे उनकी संख्या अपने आप कम होती चली जाएगी।

उन्होंने कहा कि”कुत्ते हमारे समाज के नैचुरल बैलेंस का हिस्सा हैं। सदियों से वो हमारे साथ रहते आए हैं – गलियों की रखवाली करते, दोस्ती निभाते, और चुपके से पर्यावरण का अहम हिस्सा बनते हुए। हमें उनकी देखभाल प्यार, जिम्मेदारी और सही तरीके से करनी चाहिए। नसबंदी और टीकाकरण ही असली जवाब हैं, न कि उन्हें कहीं और भेज देना।” स्ट्रीट डॉग का विरोध करने वाले अधिकांश ऐसे भी हैं जो हिंदुत्व की राजनीति करते हैं लेकिन यही नहीं जानते कि उनका धर्म कुत्तों के बारे में क्या कहता है?

सरामा के चलते इंसानों को मिला गाय का दूध

ऋग्वेद दुनिया का पहला ऐसा ग्रंथ है जिसमें की कुत्तों को इंसान का सबसे अच्छा दोस्त बताया गया है। ऋग्वेद में सरामा नाम की एक कुत्तिया का उल्लेख है जो कि इंद्र की पालतू थी। उसने भगवान इंद्र के साथ कईं युद्धों में भाग लिया था। ऋग्वेद के हिसाब से माना जाता है कि सरामा ही दुनिया के सारे कुत्तों की मां है। एक बार जब पणियों ने किसानों की गाय चुरा ली थी तब इंद्र ने उन गायों को खोजने की जिम्मेदारी सरामा को सौंपी थी। सरामा ने पणियों (गायों के चोर) का पीछा किया और गाय तक पहुंच गई। पाणियों ने सरामा मांस की रिश्वत देने की कोशिश की और मांस लेकर वहां से चले जाने को कहा, लेकिन सरामा ने मना कर दिया और वह गाय लेकर ही लौटी। इससे प्रसन्न होकर इंद्र ने सरामा को वरदान दिया कि तुम गाय लेकर आई हो उनके दूध पर तुम्हारा अधिकार होगा। इस पर सरामा ने कहा कि हमारे साथ-साथ इस दूध पर मनुष्य को भी अधिकार दे दो।

ऋग्वेद के हिसाब से इस तरह से सरामा के कारण गाय का दूध इंसान के लिए उपलब्ध हुआ। शायद सरामा को यह नहीं पता था कि वह जिस इंसान पर इतना विश्वास कर रही है वह उसकी आने वाली पीढियां के साथ कितना बड़ा विश्वासघात करेंगे? हो सकता है कि यदि सरामा ने गाय के दूध पर मनुष्य को भी अधिकार देने की बात नहीं की होती तो कुत्ते आज सड़कों पर भूखे नहीं घूम रहे होते और आज ये समस्या नहीं पैदा होती?

ब पिल्ले को मारने के बाद अनजान द डर से पीड़ित रहे जन्मेजय

खैर सनातनी परंपरा में आगे बढ़ते हैं। महाभारत की शुरुआत भी कुत्ते की घटना से होती है और उसका अंतिम अध्याय भी कुत्ते के साथ ही समाप्त होता है। प्रथम अध्याय में जन्मेजय अपने भाइयों के साथ यज्ञ की तैयारी कर रहे होते हैं। इसी बीच उनके भाई वहां पहुंचे एक पिल्ले की पिटाई कर देते हैं। पिल्ला रोता हुआ अपनी मां के पास पहुंचता है। मां उससे कहती है कि उसने जरूर कोई अपराध किया होगा इसलिए जन्मेजय के भाइयों ने उसे पीटा है। इस पर पिल्ला कहता है कि ना तो उसने किसी चीज को अपवित्र किया और न हीं यज्ञ की वेदी की ओर देखा फिर भी उसे मारा गया है।इससे गुस्सा होकर कुतिया जन्मेजय के पास पहुंचती है और कहती है कि तुमने मेरे बच्चे को बिना वजह क्यों मारा?

जनमेजय और उनके भाईयों को कोई कारण नहीं सूझता तो वह चुप बैठे रहते हैं। इस पर कुतिया उनसे कहती है कि तुमने मेरे पिल्ले को बिना वजह मारा है इसके चलते तुम जिंदगी भर अनजान डर से भयभीत रहोगे । जन्मेजय अपने जीवन के लंबे समय तक अनजान डर से भयभीत ही रहे।

वफादार प्राणी को त्यागना धर्म के खिलाफ

वहीं महाभारत का समापन युधिष्ठिर के स्वर्ग जाने के साथ होता है, जहां पर उनके साथ उनके कुत्ते को अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलती है तो वह स्वयं भी स्वर्ग जाने से इनकार कर देते हैं। युधिष्ठिर इस बात पर अडिग रहते हैं कि वे अपने वफादार कुत्ते को नहीं छोड़ेंगे, जो उनकी पूरी यात्रा में उनके साथ रहा। वे कहते हैं कि एक वफादार प्राणी को त्यागना धर्म के खिलाफ है। अंत में, यह पता चलता है कि वह कुत्ता कोई साधारण कुत्ता नहीं, बल्कि स्वयं यमराज या उनके प्रतीक के रूप में था, जो युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा और वफादारी की परीक्षा लेने आए थे।

पुजारी और कुत्ता एक समान

इतना ही नहीं भगवद गीता के अध्याय 5 श्लोक 18 में कहा गया है कि एक ब्राह्मण (एक पुजारी जो पूजा समारोह आयोजित करता है), एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ता और एक व्यक्ति जो शारीरिक श्रम में संलग्न है, एक समान ही हैं। भौतिक दृष्टि से ये प्रजातियाँ विपरीत हैं। हालाँकि, आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न एक सच्चा विद्वान व्यक्ति उन सभी को समान आत्माओं के रूप में देखता और व्यवहार करता है। यानी कि गए मेहनतकश इंसान हाथी और कुत्ते को एक समान माना गया है। कुत्तों से नफरत करने वाले क्या गीता से यह श्लोक मिटा सकते हैं?

सनातनी होने का दम भरने वालों को यह भी पता होना चाहिए कि वे अपनी राजनीतिक यात्रा में जिस काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम का उपयोग कर रहे हैं, वहां पर जब हमला हआ था (कौन सा और किसने किया था यह बताने की जरुरत नहीं है) तो पहली लड़ाई काशी के कोतवाल के मंदिर पर मौजूद श्वानों ने ही लड़ी थी।

राम राज्य यानी पशु के साथ भी न्याय

इसके अलावा राम राज्य की बात करने वाले लोग क्या भगवान राम से न्याय मांगने आए कुत्ते की कहानी भूल सकते हैं? राम राज्य में इस बात काभी ध्यान रखा गया था कि पशु के साथ भी अन्याय ना हो, भगवान राम इस श्वान की व्यथा सुनाने के बाद उसे ही यह अधिकार देते हैं कि वह आरोपी ब्राह्मण का दंड स्वयं तय करें।

इंटरवेनर को सुने बिना मर्जी का ऑर्डर दे देना क्या राम राज्य है? पशु सेवा करने वाले बिना स्वार्थ के यह सब करते हैं। क्योंकि न तो पशु किसी के सामने उनकी तारीफ कर सकता है कि ये लोग उसकी भूख प्यास का ध्यान रखते हैं और न ही पशुओं को इस देश और दुनिया में मताधिकार प्राप्त है कि वे पशु सेवकों को वोट देकर उन्हें नेता बना देंगे। ऐसे में पशु सेवा करने वालों को कुछ नहीं मिलता है। वहीं इंसान की सेवा तो वोट और प्रशंसा के लिए कोई भी कर सकता है? नेता तो यह करते ही आए हैं ?

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