इंदौर: मेट्रो स्टेशन के लिए पेड़ हटाने पर तुरंत ही मारे जाएंगे सैकड़ों परिंदे
ब्रीडिंग सीजन में तोतों के बच्चों और अंडों को मुश्किल में डालना ठीक नहीं
सुचेन्द्र मिश्रा। इन्दौर
शहर की हरियाली और जैव-विविधता के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। रीगल तिराहे (रानी सराय) में प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन के लिए लगभग 250 पुराने पेड़ काटने की तैयारी है। ये पेड़ सिर्फ छाया और ऑक्सीजन नहीं देते, बल्कि हजारों भारतीय रोज़-रिंग्ड पैराकीट (Rose-ringed Parakeet, आम बोलचाल में “तोता”) के प्राकृतिक घोंसलों के रूप में काम करते हैं। तोतों के बायोलॉजिकल सर्कल के हिसाब से उनका ब्रीडिंग का समय चल रहा है और ऐसे में उनके घोसलों में अंडे और बच्चे हो सकते हैं। पेड़ हटाए जाने पर बड़े तोता तो उड़ कर जा सकते हैं लेकिन इन अंडों और बच्चों का क्या होगा? क्या शहर के जिम्मेदार इसके बारे में सोचेंगे?

पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय निवासी चेतावनी दे रहे हैं कि अभी इन पेड़ों में तोतों के घोंसले भरे पड़े हैं, अंडे और नवजात बच्चे मौजूद हैं।
तोतों का जैविक चक्र (Biological Cycle)
भारत में, खासकर मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्रों में, ये पक्षी सितंबर-दिसंबर में जोड़े बनाते हैं और मुख्य रूप से दिसंबर से मार्च तक अंडे देते हैं। जनवरी-फरवरी peak breeding season होता है। मादा 3-6 अंडे (औसत 4) देती है, जिन्हें 22-24 दिन (ज्यादातर 23 दिन) तक सेती है। अंडे से बच्चे hatch होने के बाद, वे घोंसले में 6-8 सप्ताह (लगभग 40-56 दिन) रहते हैं, जहां माता-पिता उन्हें दाना खिलाते हैं। इस दौरान बच्चे उड़ने लायक (fledge) हो जाते हैं। पूरी तरह स्वतंत्र होने में और कुछ हफ्ते लगते हैं।
अभी जनवरी का महीना है—breeding season का चरम समय
तोतों के बायोलॉजिकल साइकिल के हिसाब से फिलहाल घोंसलों में अंडे incubating हैं या नए hatch हुए चूजे (naked pink skin वाले) हैं, जो पूरी तरह निर्भर हैं। पेड़ काटने से अंडे टूटेंगे, बच्चे मरेंगे, और वयस्क पक्षी बेघर होकर शहर में इधर-उधर भटकेंगे। जानकारी के हिसाब से तोते के बच्चों के पैदा होने से उड़ने तक के समय मानसून आने के पहले तक चलता है यानी कि जून और जुलाई के महीना तक इन पेड़ों में तोते के बच्चे रहेंगे जो कि इस समय तक पेड़ हटाए जाने की स्थिति में अपनी जान गवाएंगे।

क्लाइमेटचेंज के इंडिकेटर
शहर के पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि ये तोते न केवल शहर की पारिस्थितिकी में अहम भूमिका निभाते हैं, कीट नियंत्रण, बीज प्रसार और जैव-विविधता संतुलन में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनका नुकसान लंबे समय तक शहर की ecology को प्रभावित करेगा। इतना ही नहीं मालवा क्लाइमेट चेंज के दौड़ से भी गुजर रहा है ऐसे में क्लाइमेट चेंज की स्थिति बनने का संकेत भी इन पक्षियों से ही मिलता है। जैसे ही पक्षी शहर छोड़ कर जाने लगेंगे तो यह क्लाइमेट चेंज के संकेतक के रूप में कार्य करेगा इसके चलते इनका शहर में रहना बेहद जरूरी है।
25 दिन से जारी है गांधीगिरी
इन पेड़ों और तोतों के नैसर्गिक आवास को बचाने के लिए कई स्थानीय संगठन मैदान में है। जनहित पार्टी और पर्यावरण कार्यकर्ता 25 दिनों से गांधीगिरी के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं। वे रानी सराय में धरने पर बैठे हैं और मांग कर रहे हैं कि मेट्रो स्टेशन के लिए वैकल्पिक स्थान का उपयोग करें। उनका आग्रह है कि यहां के पेड़ों को ना छेड़ा जाए।
इंदौर मेट्रो विकास जरूरी है, लेकिन क्या विकास की कीमत पर हजारों निर्दोष पक्षियों का जैविक चक्र तोड़ना उचित है? विशेषज्ञ कहते हैं, अगर अभी नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ कंक्रीट देखेंगी, तोतों की चहचहाहट नहीं सुने सकेंगी।
आज बांधेंगे रक्षा सूत्र और कैंडल मार्च
पेड़ और पक्षी बचाने के अभियान में लगे संगठनों के कार्यकर्ता और शहर के पर्यावरण प्रेमी शनिवार शाम 5 से 7 बजे के बीच रानी सराय स्थित इन पेड़ों को रक्षा सूत्र बंधेंगे साथ ही तोतों को बचाने की मांग को लेकर एक कैंडल मार्च भी निकालेंगे।
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