पहले भी नरेंद्र मोदी सरकार को मुश्किल में डाल चुके हैं जस्टिस पारदीवाला
आवारा श्वान के मामले से पहले, तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला सुनाकर विपक्ष के हीरो बन गए थे पारदीवाला
11 अगस्त को स्वतः संज्ञान लेकर दिल्ली एनसीआर क्षेत्र के कुत्तों को बेदखल करने का आदेश देने वाले जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस महादेवन की खंडपीठ पहले भी नरेंद्र मोदी सरकार के लिए मुश्किल ने खड़ी कर चुकी है। मामला तमिलनाडु सरकार द्वारा वहां के राज्यपाल के खिलाफ दायर मामले में दिए गए आदेश का है। इस मामले में इस खंडपीठ ने ठीक उसी तरह से संविधान के अनुच्छेद 142 के अधीन राज्यपाल द्वारा विधेयक को स्वीकृति दिलाने की समय सीमा तय करने का आदेश दिया था, जिस तरह की उन्होंने अभी संसद द्वारा पारित एबीसी रूल्स होने के बावजूद कुत्तों को बेदखल करने का आदेश दिया है।

तमिलनाडु सरकार के मामले में जस्टिस पारदीवाला की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए 8 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल आर.एन. रवि मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसने केंद्र की मोदी सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों को मंजूरी में देरी और उन्हें राष्ट्रपति को भेजने की कार्रवाई को “अवैध” और “असंवैधानिक” ठहराया। इन विधेयकों में राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति से संबंधित कानून शामिल थे, जो 2020 से 2023 के बीच विधानसभा द्वारा पारित किए गए थे।
कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत इन विधेयकों को स्वतः स्वीकृत घोषित कर दिया। इस फैसले ने केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तनाव को फिर से उजागर किया। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कोर्ट पर “सीमा लांघने” का आरोप लगाया और संसद-विधानसभाओं को बंद करने की बात कही। केंद्र ने भी इस फैसले पर आपत्ति जताई, इसे राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों में दखल माना।
मोदी सरकार ने दिया जवाब
राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों पर मंजूरी या रोक लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र ने शनिवार को तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। केंद्र ने कहा कि शीर्ष अदालत का यह फैसला संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों के दायरे में अनुचित दखल है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन को अस्थिर कर सकता है। केंद्र ने अपनी लिखित दलीलों में कहा, “विस्तृत न्यायिक पुनरीक्षण की प्रक्रिया संवैधानिक संतुलन को अस्थिर कर देगी और तीनों अंगों के बीच संस्थागत पदानुक्रम पैदा कर देगी। न्यायपालिका हर संवैधानिक पेचीदगी का समाधान नहीं दे सकती।”
केंद्र ने कहा, “राष्ट्रपति और राज्यपालों के निर्णयों पर न्यायिक शक्तियों का उपयोग करना न्यायपालिका को सर्वोच्च बना देगा, जबकि संविधान की मूल संरचना में ऐसा नहीं है। तीनों अंग (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) एक ही संवैधानिक स्रोत से शक्ति प्राप्त करते हैं और किसी को भी दूसरों पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है।
विपक्ष ने बताया था अपनी जीत
विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की जीत करार दिया, विशेष रूप से केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने जस्टिस पारदीवाला की प्रशंसा की थी। उनके निर्णय ने केंद्र-राज्य संबंधों में राज्यपालों की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। यह फैसला मोदी सरकार के लिए एक चुनौती बन गया है, क्योंकि यह गैर-बीजेपी शासित राज्यों को विधायी स्वायत्तता प्रदान करता है और केंद्र के प्रभाव को सीमित करता है।
इसके बाद, 11 अगस्त 2025 को इसी बेंच में जो कुछ किया वह भी अनुच्छेद 142 के अधीन किया और इस बेंच ने स्ट्रीट डॉग्स को स्थाई रूप से शेल्टर होम भेजने की आदेश दिए हैं। इस आदेश के बाद भारतीय जनता पार्टी के रेखा गुप्ता जैसे मुख्यमंत्री, कई विधायक और महापौर, पारदीवाला की बेंच के आदेश को मानने के लिए बड़े आतुर दिखाई दिए। इस आदेश को लेकर पूरे देश में हंगामा मचा हुआ है और एनिमल लवर्स इस बार वोट के जरिए इसका हिसाब करने की बात कर रहे हैं। इस मामले में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का भी सहयोग मिला।
उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अव्यवहारिक बताते हुए कहा कि कुत्तों की नसबंदी पर जोर दिया जाना चाहिए। भागवत खुद भी एक वेटरनरी डॉक्टर हैं। उनके इस वक्तव्य के बाद सीएम रेखा गुप्ता, दूसरे कुछ उन सांसदों, विधायकों और महापौरों की स्थिति हास्यास्पद हो गई हैं, जो लंबे समय सेइन स्ट्रीट डॉग्स के खिलाफ घोषित-अघोषित मुहिम चला रहे थे। खास बात यह है कि इस मामले में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना की है।
क्या है अनुच्छेद 142
संविधान का अनुच्छेद 142 भारत के सर्वोच्च न्यायालय को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए ऐसे आदेश या डिक्री जारी करने का अधिकार है, जो कानून के दायरे में आवश्यक हों, भले ही वे मौजूदा कानूनों में स्पष्ट रूप से उल्लिखित न हों। यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को असाधारण परिस्थितियों में लचीलापन देता है ताकि वह न्याय के हित में उचित कदम उठा सके।
मुख्य बिंदु:
न्याय के लिए शक्ति: अनुच्छेद 142(1) कहता है कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री या आदेश पारित कर सकता है, जो पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक हो, और यह आदेश पूरे भारत में लागू होगा।
विशेष परिस्थितियाँ: इसका उपयोग तब किया जाता है जब सामान्य कानूनी प्रक्रियाएँ पर्याप्त नहीं होतीं, जैसे पर्यावरण, मानवाधिकार, या सार्वजनिक हित के मामलों में।
उदाहरण: इसका उपयोग कोयला खदान आवंटन रद्द करने, बाबरी मस्जिद मामले में फैसले, या यूनियन कार्बाइड मामले में मुआवजा तय करने जैसे मामलों में हुआ है।
हालांकि, इसकी शक्ति असीमित नहीं है और इसे संविधान के मूल ढांचे और अन्य प्रावधानों के अनुरूप इस्तेमाल करना होता है।