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दशहरा रैली में खोखले साबित हुए शिंदे, ठाकरे को बढ़त!

शिव सैनिक अब भी साथ, शिवाजी पार्क ने दी ठाकरे को नई ताकत

 मुंबई.

इतिहास में पहली बार मुंबई शिवसेना की दो शहरा रैलियों का गवाह बना। शिवाजी पार्क में शिवसेना की दशहरा रैली की पंरपरा 66 वर्ष पुरानी है लेकिन इस बार एकनाथ शिंदे के अलग गुट बना लेने के कारण ये रैली खास हो गई और शिंदे द्वारा शिवसेना पर दावा कर दिए जाने के बाद इस रैली पर सभी की निगाहें थीं। इस रैली ने यह साबित कर दिया है कि दर्जनभर सासंद और 41 विधायकों के साथ छोड़ देने के बाद भी उद्धव ठाकरे की शिवसैनिकों पर अब भी पकड़ है और उनकी सहानुभूति ठाकरे परिवार के साथ ही है। इसके उलट दशहरा रैली के आयोजन के तौर तरीकों और अपने लिखित भाषण के जरिए शिंदे भाजपा की कठपुतली ही दिखाई दिए।

रैली के पहले कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं जिनसे शिंदे गुट पर बड़े सवाल खड़े हुए हैं। कईं मराठी न्यूज चैनलों ने इस तरह के वीडियो जारी किए हैं जिनमें दिखाया गया है कि शिंदे गुट ने महाराष्ट्र में काम कर रहे बिहारी मजदूरों को मुफ्त यात्रा और खाने का लालच देकर रैली में बुलाया है। ठाकरे की हर बात का जवाब देने वाला शिंदे खेमा इस पर चुप्पी साधे है। इसी के साथ एक ऑडियो क्लिप भी सामने आई है जिसमें एक शिवसैनिक एक कॉल रिकॉर्डिंग सुना रहा है कि किस तरह उसे शिंदे की रैली में बीकेसी जाने के लिए एक हजार रुपए का लालच दिया गया है। बात यहीं तक सीमित नहीं रही है कुछ चैनलों ने इस तरह की रिपोर्ट भी दिखाई हैं जिनमें रैली में आने वाले बता रहे हैं कि उन्हें नहीं पता कि वे किसकी रैली में जा रहे हैं।

एक शर्मनाक घटनाक्रम भी सामने आया है जिसमें शिंदे गुट का स्टिकर लगी गाड़ी में बैठे कुछ लोगों को उतार कर महिलाएं पीट रहीं हैं। ये वीडियो नाशिक का बताया जा रहा है। इसके बारे जा जानकारी सामने आई है उसके अनुसार इस गाड़ी में बैठे शिंदे समर्थकों ने महिलाओं को अश्लील इशारे किए थे। इसके बाद इनकी पिटाई की गई और ये लोग हाथ जोड़कर माफी मांगते भी देखे गए।

इन सभी वीडियों को मराठी न्यूज चैनलों ने दिखाया है जबकि सामान्यत: ये माना जाता है कि स्थानीय न्यूज चैनल स्थानीय सरकार के खिलाफ कम ही जाते हैं। ऐसे में इन वीडियो से शिंदे गुट रैली के पहले ही बैक फुट पर आ गया था।

क्या कहा ठाकरे ने

उद्धव ठाकरे के भाषण को लेकर उत्सुकता थी हालांकि ये पता था कि इस बार उनका भाषण शिंदे गुट को लेकर ही रहेगा। दिन में शिंदे ने हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियां ट्वीट कर ठाकरे के परिवारवाद पर निशाना साधा था। उद्धव ने इसका जवाब भी अपने भाषण में दिया। उन्होंने कहा कि बाप को मंत्री, बेटे को सांसद और पता नहीं कितनों को कॉरपोरेटर बनाया। ठाकरे के इस वार से शिंदे तिलमिला उठे और उनके सांसद बेटे ने इस बारे उद्धव ठाकरे को एक पत्र भी लिखा। इसके साथ ही उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस-एनसीपी के साथ सरकार बनाने और हिन्दुत्व छोड़ने के आरोप पर भी शिन्दे पर वार किया कि जब मैने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली उस समय आप भी मंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तब आपने ये बात क्यों नहीं कही?

अपने भाषण में शिन्दे ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। ठाकरे ने भाजपा को भी आईना दिखाया और कहा कि जब मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ सरकार बना रहे थे तब हिन्दुत्व कहां था। साथ ही ये भी पूछा हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत मस्जिद में गए थे, इस हिसाब से तो वो भी हिन्दू नहीं रहे होंगे? बाला साहेब ने नाम का उपयोग करने को लेकर उद्धव ने शिंदे को बाप चुराने वाली औलाद भी बताया है।

क्या कहा शिंदे ने ?

एकनाथ शिंदे ने अपनी रैली में भाषण पढ़ा। उम्मीद के अनुसार उन्होंने वही बातें कहीं जो कि वे अब तक कहते आए हैं। उनके भाषण में तेवर नदारद थे। उन्होंने गद्दार कहे जाने के आरोप पर उद्धव ठाकरे को जवाब दिया कि गद्दारी वो थी जब आपने नरेन्द्र मोदी के फोटो पर वोट मांगे और सरकार बनाने के लिए कांग्रेस एनसीपी के साथ हो गए। शिंदे ने हिन्दुत्व की बात की लेकिन उद्धव ठाकरे के आरोपों का जवाब नहीं दिया। इसके उलट वे मंच पर बाल ठाकरे को बड़े बेटे जयदेव और उनकी पूर्व पत्नी स्मिता ठाकरे को रैली में लाकर ये संदेश देने की कोशिश करते दिखे कि ठाकरे परिवार भी उनके साथ है।

हालांकि जयदेव ठाकरे को बाला साहेब ठाकरे ने ही अपने जीवित रहते मातोश्री से निकाल दिया था। जयदेव को बाला साहेब ने अपनी संपत्ति से भी बेदखल किया हुआ है। यहां तक कि स्मिता ठाकरे भी जयदेव ठाकरे के साथ नहीं रहती हैं। उन्होंने स्मिता को तलाक देकर तीसरी शादी की थी। ऐसे में शिंदे इस दाव से जो संदेश देना चाहते थे वो नहीं हो पाया। इस विषय पर शिवसेना की ओर से भी कोई बयान नहीं देकर उन्होंने इस मामले को तूल नहीं दिया है।

कुछ दिन पहले शिंदे ने बाला साहेब के निजी सहायक चंपा सिंग थापा को अपने साथ लाकर ये संदेश देने की कोशिश की थी कि बाला साहेब के नजदीकी लोग भी उद्धव को छोड़ रहे हैं जबकि थापा बाला साहेब के निधन के बाद ही मातोश्री छोड़कर नेपाल चले गए थे। इसके बाद उद्धव कैंप ने शिंदे पर निशाना साधते हुए कहा था कि कुछ मातोश्री की कुत्ते घुमाने वाले भी हैं, उन्हें भी ले जाओ। कुलमिलाकर जहां उद्धव रैली में आक्रामक दिखे तो वहीं शिंदे अपने भाषण में स्पष्टीकरण देते दिखाई दिए।

इसके अलावा कईं चैनलों ने इस तरह के वीडियो भी चलाए हैं जिसमें कि शिंदे रैली को संबोधित कर रहे हैं और लोग मैदान छोड़कर जा रहे हैं। साथ ही शिंदे के भाषण के दौरान उन्हीं के गुट के प्रवक्ता दीपर केसरकर सोते भी दिखाई दिए। शिंदे पर भाजपा का भाषण पढ़ने का आरोप भी लगा है।

राणे पर कटाक्ष

ईडी की जांच में फंसने के बाद भाजपा में शामिल हो मोदी सरकार में मंत्री बने नारायण राणे और उद्धव ठाकरे के बीच भी छत्तीस का आंकड़ा है। कहा जाता है कि उद्धव के कारण ही राणे को शिवसेना छोड़ना पड़ी थी। वे भी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने को लेकर उद्धव के खिलाफ बयानबाजी करते रहते हैं। दशहरा रैली में उद्धव ने राणे पर भी कटाक्ष किया जो नारायण राणे दस साल तक सोनिया गांधी के पैरों में लौटकर मंत्री पद का सुख लेते रहे वो अब हमें हिन्दुत्व सिखा रहे हैं। आमतौर पर मुखर रहने वाले नारायण राणे ने इस बात कर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। प्रतिक्रिया देवेन्द्र फड़नवीस की जरुर आई है जिसमें उन्होंने उद्ध‌व को अपना भाषण लेखक बदलने की सलाह दी है।

ठाकरे को राहत और बढ़त

उद्ध‌व ठाकरे को चुनाव चिन्ह के मामले में सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है लेकिन दशहरा रैली से उन्हें जरुर राहत मिली है। शिवसेना की दशहरा रैली के लिए न तो भीड़ को लाया जाता है और न ही उनके लिए खाने का कोई इंतजाम किया जाता है जबकि शिंदे की रैली में न केवल लोगों को लाने के लिए बसों का इंतजाम किया गया बल्कि खाने की व्यवस्था भी की गई थी। इसके बाद भी उद्धव की रैली की भीड़ ने बता दिया है कि पार्टी के जो लोग शिंदे के साथ गए हैं वो अपने साथ पार्टी का कॉडर नहीं ले जा सके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि यदि अंधेरी उपचुनाव में परिणाम अनुकूल नहीं आए तो संभव है कि भाजपा शिंदे को मुख्यमंत्री पद से हटा दे। क्योंकि दशहरे ने साबित कर दिया है कि शिंदे अपने संसदीय क्षेत्र के बाहर के नेता नहीं हैं।

ठाणे के जो कारपोरेटर जो शिंदे के साथ गए थे उनमें भी चार ठाकरे के पास लौट चुके हैं। शिंदे जिन आनंद दिघे को अपनी गुरू मानते हैं उनके भतीजे केदार दिघे उद्धव के साथ हैं और खास बात ये है कि केदार के उद्धव के साथ जाने के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने एक मामले में उनके खिलाफ एफआईआऱ् भी दर्ज की है। कुलमिलाकर दशहरे से साबित हो गया है कि महाराष्ट्र में उद्धव के साथ सहानुभूति का माहौल बन रहा है। यदि धनुष बाण भी उनसे छीन लिया जाता है तो सहानुभूति और भी बढ़ेगी और राजनीति में शक्ति से ज्यादा सहानुभूति की जरुरत होती है। ऐसा लगता नहीं है कि धनुष बाण लेकर भी शिंदे कुछ हासिल कर पाएंगे।

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