28th January 2022

किस राजनीति की प्रयोगशाला है लखीमपुर खीरी?

मौत कहीं भी हो, कैसी भी हो अंदर तक हिला देती है। और जब मरने वालों के वीडियो सामने हो और उनकी आंखों में आप मौत की दहशत को पढ़ सकते हों तो फिर सवाल उठने लगता है कि क्या आप वाकई 21वी सदी में जी रहे हैं? 

लखीमपुर खीरी में जो हुआ वो भारतीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष की अपने आप को सबसे बेहतर स्क्रिप्ट राइटर साबित करने की प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। लेकिन एक सफल फिल्म की तरह इन स्क्रिप्टों में भी तकनीकी त्रुटियों की भरमार है । क्या आपको ऐसा लगता है कि कोई आयोजक अपने ही आयोजन को बर्बाद करने के लिए वहां हिंसा करेगा? संभवतः पागलखाने भेजे जाने के लिए एकदम उपयुक्त आदमी भी ऐसा नहीं करेगा।  तो ऐसी स्थिति में नेता और मंत्री अपने ही आयोजन में ग़दर मचाएंगे यह बात कुछ हजम नहीं होती।

 रही सही कसर ड्राइवर के वीडियो ने पूरी कर दी है। खून से लथपथ ड्राइवर के ऊपर अपने आप को किसान कहने वाली भीड़ दबाव बनाने में लगी हुई है कि बोल तुझे टेनी ने भेजा है। दरअसल पूरे घटनाक्रम के स्क्रिप्ट राइटर, डायरेक्टर और एक्टर यही लोग हैं। कुल मिलाकर इस एक वीडियो से यह साबित होता है कि किसान आंदोलन वास्तव में क्या है? यह विशुद्ध रूप से विपक्ष का राजनीतिक प्रयोग है। वही विपक्ष जो अपने ही घर में अपने ही लोगों को नहीं संभाल पा रहा है। 

लेकिन राजनीति में विपक्ष की इस करतूत से सत्ता पक्ष को क्लीन चिट नहीं मिल जाती । सारी पुलिस और इंटेलिजेंस आपके पास है लेकिन आपको कानों-कान खबर नहीं होती कि क्या होने वाला है? और ऊपर से आपके समर्थकों का यह अहंकार और दंभ कि आप दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री हैं! 

भारतीय जनता पार्टी की सरकारों को करीब से देखने पर पता चलता है इनका पुलिस और प्रशासन पर कोई नियंत्रण नहीं हैं क्योंकि यदि भारतीय जनता पार्टी की सरकार सक्षम होती और योगी आदित्यनाथ एक दूरदर्शी मुख्यमंत्री होते तो सबसे पहले उन्होंने इंटेलिजेंस फैलियर को लेकर पुलिस और प्रशासन के पिछवाड़े सूजा देने चाहिए थे?  क्योंकि इतनी बड़ी घटना बिना किसी प्लानिंग और तैयारी के संभव नहीं है।  दूसरा सवाल यह भी है कि विरोध करने वाले किसान वहां तक पहुंचे कैसे और यदि पहुंच भी गए थे तो उनकी निगरानी करने के लिए कोई सुरक्षा बल वहां क्यों नहीं था? यदि भाजपा और उसके समर्थक इन सवालों को नहीं उठाते तो यह माना जाएगा कि वे भी विक्टिम कार्ड खेलने के दोषी हैं। वही विक्टिम कार्ड जो बंगाल में जमकर खेला जा रहा है हालांकि उपचुनाव ने बता दिया कि उसका कोई फायदा नहीं हुआ है।

देखने में आया कि दर्जनों गाड़ियों के काफिले के साथ आईजी साहब घटना के बाद घटनास्थल पर पहुंचे। उनसे पूछा जाना चाहिए कि वे घटना के पहले कहां थे और अब उन्हें घटनास्थल से पैदल ही अपने घर भेज दिया जाना चाहिए। लेकिन नौकरशाहों और पुलिस के भरोसे चलने वाली सरकारों से यह उम्मीद करना बेमानी है। 
राजनीति में जब से चुनाव विशेषज्ञों का आगमन हुआ है तब से घटनाएं और उनकी प्रतिक्रियाएं भी स्क्रिप्टेड होने लगी हैं। वही चुनावी विशेषज्ञ सबसे सफल है जो अच्छा स्क्रिप्ट राइटर है। स्क्रिप्ट में अपनी नेता का पैर तुड़वाने तक की व्यवस्था की जाती है और जीतने के बाद उसकी सफलता का जश्न भी टूटी हुई टांग पर खड़े होकर नाचते हुए मना लिया जाता है।

लखीमपुर की घटना में मरने वालों भाजपा कार्यकर्ताओं की जाति भी देखिये। वे सभी ब्राह्मण हैं। वही ब्राह्मण जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वह इस बार भाजपा को वोट नहीं करेंगे क्योंकि योगी आदित्यनाथ स्वयं राजपूत होने के नाते यूपी में ब्राह्मणों के मुकाबले राजपूतों को खड़ा करने में लगे हुए हैं। धनंजय सिंह जैसे हिस्ट्रीशीटर की पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष बन गई है और 2022 में धनंजय सिंह फिर विधायक बन जाएंगे। लेकिन विधायक विजय मिश्रा बाहुबली हैं  और उनके पीछे यूपी की सरकार हाथ धोकर पड़ी है। यूपी में चर्चा है कि यदि वे मिश्रा की जगह सिंह होते तो शायद बच जाते। यही कारण है कि बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज पार्टी में बदलने के लिए आतुर है। बहन जी के भाई साहब मिश्रा जी इसके लिए दिन-रात एक किए हुए हैं।

इन सबके बीच एक सवाल जो आदि काल तक नरेंद्र मोदी का पीछा करेगा कि जब किसानों ने कानून मांगे ही नहीं तो आप तश्तरी में सजाकर उन्हें कानून देने क्यों पहुंच गए? मोदी जी यदि किसान कानून नहीं लाते तो क्या अलोकप्रिय हो जाते ? कुल मिलाकर लखीमपुर खीरी उस राजनीति की प्रयोगशाला है जो राजनीति को ही निर्वस्त्र करती है। ये उन लोगों की कलाई भी खोलती है जो दिन भर आर्यन खान के बाप की फिल्म का गाना आई एम द बेस्ट गुनगुनाते हैं। वही आर्यन खान जो क्रूज में ड्रग्स के साथ धाराएं हैं। 


Suchendra Mishra

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