आखिर दोस्ती सबसे बड़ी है…

नोएडा.

कहा जाता है कि friendship is like an oxygen in life, और कोरोना की महामारी भी उनकी दोस्ती नहीं रोक सकी। एक दोस्त कोरोना पॉजीटिव होकर नोएडा के अस्पताल में भर्ती था। ऑक्सीजन कमी थी और डॉक्टर ने ऑक्सीजन की व्यवस्था करने को कहा। ये खबर 1400 किमी दूर बोकारो में बैठे दूसरे दोस्त ये बात पता चली। बोकारो में स्टील प्लांट होने के चलते ऑक्सीजन कम नहीं थी। लेकिन समस्या थी दूरी। फिर भी दोस्ती के दम पर दूरी हार गई और ऑक्सीजन लेकर दोस्त नोएडा पहुंच गया। अच्छी बात ये है कि दूसरा दोस्त समय पर ऑक्सीजन मिल जाने के चलते अब ठीक है।

कहानी है देवेन्द्र और रंजन की। रंजन टीचर हैं और नोएडा में रहते हैं जबकि देवेन्द्र बोकारो में। कोरना का कहर रंजन पर भी हुआ। उनका ऑक्सिजन लेवल लगातार गिरता जा रहा था, लेकिन ऑक्सिजन की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। डॉक्टरों ने कह दिया था कि मरीज की जान बचाने के लिए ऑक्सिजन की व्यवस्था करनी पड़ सकती है।

ये खबर देवेंद्र तक पहुंची तो वो परेशान हो गए। नोएडा में तो ऑक्सिजन नहीं था लेकिन बोकारो में स्टील प्लांट के चलते ऑक्सीजन मिल रही थी। लेकिन समस्या थी नोएडा और बोकारो के बीच की 1400 किमी की दूरी। सिलेंडर का नोएडा पहुंचना जरुरी था। देवेन्द्र ने तय किया कि दोस्त की जान बचाने के लिए वे ऑक्सीजन लेकर बोकारो से नोएडा 1400 किलोमीटर का सफर नोएडा जाएंगे।

ऑक्सीजन थी लेकिन सिलेंडर नहीं


बोकारो में कई प्लांट और सप्लायर का दरवाजा खटखटाया, सभी ऑक्सीजन देने को तैयार थे लेकिन समस्या सिलेंडर की थी। बिना खाली सिलेंडर के कोई भी ऑक्सिजन देने को तैयार नहीं हुआ। बहुत कोशिशों के बाद एक अन्य मित्र की मदद से बियाडा स्थित झारखंड इस्पात ऑक्सिजन प्लांट के संचालक से संपर्क कर उन्हें परेशानी बताई तो वह तैयार हो गया, लेकिन उसने ऑक्‍सीजन सिलेंडर की सिक्योरिटी मनी जमा करने की शर्त रखी। इसके बाद देवेंद्र ने जंबो सिलेंडर के लिए 10 हजार रुपये दिए, जिसमें 400 रुपये ऑक्‍सीजन की कीमत और 9600 रुपये सिलिंडर की सिक्योरिटी मनी थी।

पुलिस ने दोस्ती के लिए जाने दिया

रविवार सुबह देवेन्द्र नोएडा के लिए अपनी कार से निकले। उन्हें नोएडा पहुंचने में 24 घंटे लगे।
कईं राज्यों में कोरोना कर्फ्यू लगा हुआ है। इसके चलते कईं स्थानों पर उनसे पुलिस ने पूछताछ भी की। उन्होंने दोस्त की जान बचाने की का हवाला देकर उनसे जाने देने का अनुरोध किया। पुलिस को भी ये महसूस हुआ कि इस दोस्ती के फर्ज के बीच उन्हें नहीं आना चाहिए। आखिर में देवेंद्र सही समय पर नोएडा पहुंच गए। फौरन ऑक्सिजन देवेंद्र को लगाया गया और उनका लेवल देखा जाने लगा। दोस्त के लाए ऑक्सिजन के लगते ही रंजन की हालत अब सुधरने लगी है।

बोकारो भी लगा है देश के लिए

देवेन्द्र और रंजन बोकारो के हैं और अभी बोकारो देश के लिए ऑक्सीजन बनाने में लगा है। बोकारो सेल में ऑक्सिजन तैयार करने के लिए दो प्लांट हैं। दोनों प्लांटों में अभी तीन शिफ्ट में 24 घंटे कर्मचारी काम कर रहे हैं। एक शिफ्ट आठ घंटे की होती है। आठ घंटे की शिफ्ट में कर्मचारी बिना-रुके काम करते रहते हैं। कर्मचारी भोजन के लिए भी ब्रेक नहीं ले रहे है।बस वे एक ही बात जानते हैं कि अभी बहुत काम है। कर्मचारियों का कहना है कि हमें अभी कोरोना मरीजों की जान बचाने के लिए छोटा सा योगदान देने का मौका मिला है। ऐसे में हम समय बर्बाद नहीं कर सकते।

बोकारो सेल प्लांट से लखनऊ के लिए लगातार ऑक्सिजन की सप्लाई हो रही है। रविवार को लखनऊ से एक बार फिर ऑक्सिजन एक्स्प्रेस पहुंची है। इसलिए कर्मचारी और तेजी से काम कर रहे हैं। इस दौरान वह अपनी भी फिक्र नहीं कर रहे हैं। संकट की इस घड़ी में सिर्फ एक ही मकसद है कि प्लांट में बिना रुकावट काम जारी रहे।

सेल में मशीनों का शोर

सेल के आइनॉक्स बोकारो प्लांट में लिक्विड ऑक्सिजन बनती है। मशीनें दिन-रात शोर कर रही हैं। बोकारो सेल प्लांट में 25 अधिकारी और 145 मजदूर दिन रात काम में लगे हैं। हर दिन यहां 150 टन ऑक्सिजन का उत्पादन हो रहा है।

बोकारो सेल के आंकड़े के अनुसार अप्रैल महीने में अभी तक सबसे ज्यादा ऑक्सिजन की सप्लाई यूपी को हुई है। यहां से यूपी को 456 मिट्रिक टन, झारखंड को 308 मिट्रिक टन, बिहार को 374 मिट्रिक टन, पश्चिम बंगाल को 19 मिट्रिक टन, पंजाब को 44 मिट्रिक टन, महाराष्ट्र को 19 मिट्रिक और एमपी को 16 मिट्रिक टन मिला है।

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