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MPPSC – रच रहा है नया इतिहास, चार साल में 11 सौ पदों पर भर्ती की प्रक्रिया लेकिन परिणाम शून्य

युवाओं का इंतजार……जो खत्म नहीं होता..

उलझनों के सुलझने का इंतजार, पहले रोस्टर, फिर आरक्षण और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिर उलझी है
एमपीपीएमसी की भर्तियां। NEYU कर रहा है संघर्ष।

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएमसी) लगातार नया इतिहास रच रहा है। वर्ष 2014 से 2018 के बीच लगातार परीक्षाओं का आयोजन किया गया और इन परीक्षाओं का परिणाम में समय सीमा में जारी हुआ। ऐसा लगा कि पिछले डेढ़ दशक से जारी एमपीपीएमसी की लेट लतीफी दूर हो गई है, लेकिन एमपीपीएमसी तो नया इतिहास रचना चाहता था। वह रच दियागया है। वर्ष 2019, 2020, 2021 में आयोजित परीक्षाओं में अब तक 11 सौ पदों पर भर्ती का आयोजन हुआ है, लेकिन अब तक एक भी पद पर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और परीक्षा परिणाम शून्य ही रहा।

बस परीक्षाएं परिणाम शून्य

एमपीपीएमसी ने वर्ष 2019 में 576 पद, 2020 में 260 पद और 2021 में 283 पदों के लिए परीक्षा ली है।
इनमें से 2019 की परीक्षा रद्द होने की कगार पर पहुंच चुकी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 14 फीसदी आरक्षण रखने की बात कही है। 2020 की मुख्य परीक्षा का परिणाम अभी आया नहीं है, लेकिन यह भी आरक्षण के जाल में उलझ जाएगी, ऐसा विषय विशेषज्ञ मानते हैं वहीं 2021 की प्रीलिम्स का परिणाम भी कटघरे में है, क्योंकि
पांचों कैटेगरी में मेल-फीमेल का कट आफ समान रखा गया है। एमपीपीएससी के इतिहास में पहली बार ऐसा कट आफ आया है। इस पर भी हाईकोर्ट में याचिका लग चुकी है।

पहले रोस्टर, फिर आरक्षण और अब सुप्रीम कोर्ट

इसमें 2019 की परीक्षा पहले रोस्टर प्रणाली, फिर 27 फीसदी आरक्षण, 87 और 13 – 13 के फार्मूले के कारण फंस गई। इसके बाद मुख्य परीक्षा का परिणाम आया और फिर 27 फीसदी आरक्षण के बहाव में बह गया। 2000 लोग साक्षात्कार के लिए चयनित होने के बाद इंतजार करते रहे और फिर मुख्य परीक्षा देने की कगार पर आ गए।
हाईकोर्ट ने फिर फैसला सुनाया और 2019 प्रीलिम्स की नई लिस्ट घोषित की गई। जिसमें 2900 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा के लिए सिलेक्ट हुए। इससे साक्षात्कार के लिए चयनित होने वालों को भी राहत मिली।

2019 की परीक्षा पर फिर संकट के बादल

मौसम वैज्ञानिक घाघ की मौसम संबंधी भविष्यवाणियों की तरह 2019 की परीक्षा फिर से रंग बदलने की तैयारी में है, क्योंकि अब सुप्रीम कोर्ट ने 14 फीसदी ओबीसी आरक्षण कायम रखने का फैसला दिया है। इससे 2019 की प्रीलिम्स के पुनः परिणाम और 2900 लोगों द्वारा दी जाने वाली मुख्य परीक्षा पर एक बार फिर संशय के बादल छाए हुए है।

असंवैधानिक है 87 – 13 – 13 का फार्मूला

सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा मप्र लोक सेवा आयोग को 87 और 13 – 13 का फार्मूला दिया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 14 फीसदी आरक्षण के फैसले के बाद इस फार्मूले को फिर चुनौती मिलेगी। यानी अब उन 2900 लोगों का क्या होगा, जो हाईकोर्ट के फैसले के बाद नई लिस्ट में क्वालीफाई घोषित किए है। हालाकि  87 – 13 – 13 का फार्मूला वैसे भी असंवैधानिक ही है। अब देखना है कि इस विषय पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद एमपी पीएससी क्या फैसला लेता है।  

– इसका प्री का परिणाम आ गया है, लेकिन परिणाम ऐसा है कि इस पर भी हाईकोर्ट में याचिका लग चुकी है। पांचों कैटेगरी में मेल-फीमेल दोनों का कट-आफ बराबर है। इससे अभ्यर्थियों का मानना है कि कट आफ गलत है।

दिग्विजय सिंह के समय भी हालत हुए थे गंभीर

वर्ष 2000 से 2005 के बीच भी एमपीपीएमसी की वैकेंसी नहीं आई थी। इस दौरान केवल बैकलॉग पदो पर भर्ती हुई थी, जिसमें केवल एससी और एसटी के 500 से अधिक पदों पर भर्ती हुई थी, लेकिन सामान्य पीएससी का आयोजन नहीं हुआ था। इस दौरान मुख्य मंत्री दिग्विजय सिहं थे। इसके बाद उमा भारती और बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने थे। खजाना खाली होने के कारण इन लोगों ने भी भर्ती को हरी झंडी नहीं दी। फिर शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने और 2005 में वैकेंसी आई, लेकिन इस समय भी पदों की संख्या मात्र 83 ही थी। जो केवल बेरोजगारों को काम में जुट जाने के लिए दी गई थी, ताकि कोई विरोध न हो।

NEYU कर रहा है संघर्ष

एमपीपीएमसी और व्यापमं की परीक्षाओं के लिए अभ्यर्थियों के हित में लगातार NEYU नाम का संगठन संघर्ष कर रहा है। इस संगठन ने सत्ता से लेकर हाईकोर्ट में लगातार अभ्यर्थियों के हित में लडाई भी लड़ी है।

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