नाड़ा तोड़ना और प्राइवेट पार्ट को छूना इसलिए रेप नहीं, पहले कोर्ट के ऑर्डर को समझें

मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मिश्रा के आर्डर का

दोस्तों अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर मिश्र का वह जजमेंट बहुत चर्चा में है जिसमें उन्होंने लिखा है कि नाडा तोड़ना और प्राइवेट पार्ट को छूना रेप नहीं है। मामला 11 साल की बच्ची से जुड़ा हुआ है इसके चलते इस टिप्पणी को लेकर पूरे देश में उबाल है। कई लोग जिनमें जाने-माने पत्रकार से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और नेता तक शामिल हैं, उनके जजमेंट में लिखी हुई इस लाइन पर सवाल उठा रहे हैं।

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जस्टिस मिश्रा द्वारा दिया गया यह जजमेंट 12 पेज का है और जब आप इस जजमेंट को पढ़ते हैं तो आपको बहुत कुछ ऐसा पता चलता है जो कि इसके बारे में चल रही खबरें आपको नहीं बताती।
हमने इस जजमेंट को पूरा पढ़ा और पढ़ने के बाद जो कुछ सामने आया तो ऐसा लगा कि जस्टिस राम मनोहर मिश्र ने अपने जजमेंट के पीछे पर्याप्त कारण दिए हैं।
सबसे पहले जानते हैं कि यह मामला क्या है और उससे ही हम इस जजमेंट के बारे में कोई राय बनाने की स्थिति में पहुंचेंगे। केस का टाइटल आकाश और अन्य वर्सेस स्टेट है। आकाश ने कासगंज की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट के समन के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिव्यू याचिका दायर की थी।

स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने आकाश और पवन को आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 के अधीन समन जारी किया था।
ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि पीड़िता की मां ने 12 जनवरी 2022 को स्पेशल पॉक्सो कोर्ट में एक आवेदन देकर आरोप लगाया था कि वह 10 नवंबर 2021 की शाम 5:00 बजे अपनी ननंद के घर से अपने गांव लौट रही थी। साथ में उनकी नाबालिग बेटी, जिसकी की उम्र लगभग 14 वर्ष है वह भी थी। उस समय आकाश, पवन और अशोक उसे कच्ची सड़क पर मिले और पूछा कि कहां से आ रही हो, क्योंकि वह लोग उसके गांव के ही हैं इसलिए उसने बताया कि वह अपनी ननंद के घर से आ रहे हैं। तब आकाश ने प्रस्ताव दिया कि वह उनकी नाबालिग बेटी को मोटरसाइकिल से सुरक्षित घर छोड़ देगा। उसके आश्वासन पर भरोसा करके महिला ने अपनी बेटी को आकाश की मोटरसाइकिल पर बैठने की अनुमति दे दी।

रास्ते में अभियुक्त रुके और उन्होंने लड़की के स्तनों को छूना शुरु किया और आकाश ने उसके पजामे का नाड़ा तोड़ दिया और उसे खींच कर ले जाने लगा। इस समय मामले के दो गवाह सतीश और भूरे लड़की की चीख सुनकर वहां पहुंचे। आकाश ने उन्हें देसी पिस्तौल से धमकाया और वहां से भाग गया।

जब आवेदिका यानी नाबालिक लड़की की मां पवन के घर शिकायत करने पहुंची तो उसके पिता अशोक ने उसे गालियां और जान से मारने की धमकी देकर भगा दिया। अगले दिन जब पुलिस स्टेशन शिकायत दर्ज करने पहुंची तो पुलिस ने इसकी शिकायत दर्ज नहीं की। कुल मिलाकर इस घटनाक्रम के आधार पर स्पेशल जज पॉक्सो कोर्ट कासगंज में एक प्राइवेट कंप्लेंट फाइल की गई थी। शिकायत के आधार पर पॉक्सो कोर्ट ने 21 मार्च 2022 को आकाश और पवन को आईपीसी की धारा 376 व पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 तथा अशोक को आईपीसी की धारा 506 और 507 में समन जारी किया।

दोस्तों यह तो हुई इस केस की कहानी लेकिन इस मामले में आपको एक और कहानी जानना जरूरी है। वह कहानी है आकाश की मां की। आकाश की मां ने 17 अक्टूबर 2021 को कासगंज के पटियाली थाने में आईपीसी की धारा 354 बी एवं 506 एवं 507 में चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसमें कहा गया था कि जब अपने बेटे आकाश के साथ खेत में गई थी तब कुछ लोगों ने उनके साथ छेड़छाड़ की और उनके कपड़े फाड़े साथ ही आकाश के साथ मारपीट भी की। इस मामले में आरोपित बनाए गए चार लोगों में से एक आकाश के मौसा थे और जो कि इस नाबालिग लड़की के चाचा लगते हैं।

यहां जाकर स्पष्ट होता है कि इन परिवारों के बीच में पहले से विवाद चल आ रहे थे जबकि यह आपस में रिश्तेदार हैं। और यहीं से एक दूसरे के खिलाफ कानून के दुरुपयोग का संदेह भी पैदा होता है। हालांकि इसका निर्णय न्यायालय में होगा लेकिन फिलहाल इस मामले में संदेह की पर्याप्त गुंजाइश है। इसी को आधार बनाकर आकाश के वकील ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कहा कि यह काउंटर FIR की कोशिश है।

उनका कहना था कि जब आकाश की मां पहले ही पीड़िता के परिवार के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज करा चुकी है तो ऐसे में पीड़िता की मां उसे आकाश के साथ क्या एक मोटरसाइकिल पर जाने देगी? इसके अलावा आकाश के वकील ने कोर्ट में कहा कि यदि शिकायतकर्ता की शिकायत को मूल रूप में स्वीकार कर भी लिया जाए तो भी यह मामला धारा 376 का नहीं बनता बल्कि 354 और 354 बी का बनता है।

चलिए अब आते हैं जस्टिस राम मनोहर मिश्र के आदेश पर। उन्होंने इस मामले में क्या पाया और क्या कहा है? जस्टिस मिश्रा ने कहा है कि आवेदिका और गवाहों के बयान में यह कहीं सामने नहीं आया है कि आकाश ने पेनिट्रेटिव सेक्स की कोशिश की। गवाह के बयान में यह भी नहीं कहा गया है कि नाड़ा तोड़ दिए जाने से पीड़िता नग्न हो गई थी। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 18, जो कि इस केस में लगाई गई है, वह अपराध करने के प्रयास की सजा का प्रावधान करती है ना कि अपराध के लिए सजा का प्रावधान। प्राइवेट कंप्लेंट कौनसी धारा में की जाए यह फरियादी का वकील ही बनाता है, ऐसे में इसमें कोर्ट की गलती कैसे मानी जा सकती है?

इसके अलावा जस्टिस मिश्रा ने यह भी लिखा है कि जिस पीड़िता को 11 वर्ष का बताया जा रहा है उसके प्राइमरी स्कूल, जहां से उसने चौथी कक्षा की पढ़ाई की है, के रिकॉर्ड में उसकी जन्म तिथि 12 फरवरी 2002 दर्ज है ।वहीं घटना की तिथि 10 नवंबर 2021 दर्ज है। इसका मतलब है कि पीड़िता की आयु घटना के समय 11 वर्ष से ज्यादा थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से भी उसके नाबालिक ना होने से इनकार नहीं किया गया है।
जस्टिस मिश्रा ने आर्डर में लिखा है कि सभी परिस्थितियों और गवाहों पर गौर करने के बाद में यह मामला 376 का नहीं लगता बल्कि इसकी बजाय इसे 354b में और पॉक्सो अधिनियम की धारा 9 या 10 में दर्ज किया जाना चाहिए।

उन्होंने स्पेशल पॉक्सो कोर्ट द्वारा जारी समन को इस हिसाब से संशोधित किए जाने का आदेश दिया है। उम्मीद करते हैं कि अब आप इस केस के मामले में सही राय बनाने की स्थिति में होंगे क्योंकि जो महत्वपूर्ण बिंदु इस केस के आपको जानने चाहिए थे, वह हमने आपको बता दिए हैं ।
जो शिकायत स्पेशल पॉक्सो कोर्ट में की गई यदि उस शिकायत को बिल्कुल वैसे ही स्वीकार भी कर लें तो भी यह मामला 354 बी का है ऐसे में 376 में समन कैसे जारी किया जा सकता था ?

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