24th February 2024

जानिए रूस में रामायण की अनूठी परंपरा को, होता रहा है रामलीला का मंचन भी

श्री राम जन्मभूमि प्राण प्रतिष्ठा के समय रूस की रामायण को न भूलें
‘रूसी रामायण’ का सिनेमा में हो चुका है मंचन, रूस में बहुत लोकप्रिय है राम कथा

वि.के. डांगे

भारत में रामकथा/रामायण प्राचीनकाल से जन-सामान्य में रही है हर भारतीय भाषा में, वाल्मिकी के रामायण पर आधारित रामायण भी है। तुलसीदास जी का रामचरितमानस, महाराष्ट्र में एकनाथी व रामदासी रामायण, द. भारत में कंबन रामायण, बंगाल में कीर्ति-बुद्धि/बुद्धिकीर्ति कृत रामायण प्रसिद्ध है। अन्य प्रांतों व भाषाओं में भी रामायण है। सद्गुरू समर्थ रामदास ने कहा है, ‘रामकथा को ब्रह्मांड भेदकर उस पार पहुंचाये’-भावार्थ यह कि रामकथा का प्रचार प्रसार दूर तक हो। इस संबंध में देखें तो इंडोचीन के देश, बर्मा (म्यांमार), थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम इन देशों तक व द.पू. एशिया के देश, सिंगापुर, मलाया व इंडोनेशिया में, रामकथा पहुंच चुकी है व वहां के जीवन का एक अंग बन चुकी है।

परंतु जहां तक यूरोप की बात वहां रामकथा नहीं पहुंची। कारण यह था कि वहां तक हिंदू धर्म नहीं पहुंचा। इसका एकमात्र अपवाद रूस है, जो भारत का निकटतम यूरोपीय देश है। रूस में वोल्गा नदी में नाव से या तट पर से, उ. ईरान, द.ईरान-खंभायत की खाड़ी, महाराष्ट्र का पश्चिमी तट, यह व्यापारिक मार्ग कम से कम 14वीं शताब्दी ई. सन तक तो पुराना है ही, भारतीय व्यापारियों की रूस में, अस्त्राखान, वोल्गा घाटी, मास्को व सांक्त-पीतुर्सबुर्ग (सेंट पीटर्सबुर्ग-पूर्व नाम लेनिनग्राद), यहां तक बस्तियां थीं और वे रूसी जार (सम्राट) को, काफी राजस्व देते थे। इन्हीं व्यापारियों व इनसे जुड़े यात्रियों द्वारा भारत विषयक कईं प्रकार की जानकारी रूस पहुंची होगी। यह ज्ञात है कि पंचतंत्र व हितोपदेश की कहानियां रूसी लोककथाओं में भी मिलती है।

उपरोक्त संदर्भ में रामकथा का विशेष महत्व है। इतिहास मान्य रूसी यात्री अफानासी निकितिन (भारत यात्रा 1466-69 या 1469-72) जो वोल्गा से उत्तर ईरान – दक्षिण इरान-खंभात रास्ते से भारत आया और ईराक-कालासागर मार्ग से रूस लौटा। उसने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है कि भारत में एक ऐसे राजा की कथा जनप्रिय है, जिसके पास बंदरों की बड़ी सेना थी। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय तक या उसके 100 (सौ) वर्ष बाद रामकथा रूस में पहुंच चुकी थी परंतु मूल वाल्मिकी रामायण, संस्कृत में, वहां नहीं पहुंचा। रामकथा की अधूरी जानकारी के आधार पर रूसी कलाकारों ने रामकथा पर आधारित चित्र बनाए। पहला चित्र राम, सीता, हनुमान व एक अन्य व्यक्ति का है। इसमें एक तख्त, (सिंहासन नहीं) पर राम व सीता बैठे हैं, दोनों के सिरों के पीछे प्रभावलय है परंतु राम के सिर पर मुकुट है, सीता के सिर पर वस्त्र (साड़ी) का पल्लू मात्र है।

राम का एक पैर तखत पर व दूसरा नीचे हनुमानजी की एक हथेली पर है। राम के पीछे एक पुरुष, जिसके सिर पर मुकुट है, हाथ में मोरपंख की पिच्छी (चंवर) लेकर खड़ा है। नीचे भूमि पर ढाल व उस पर तलवार रखी हैद्व हनुमान जी की पीठ पीछे कमर पर बाणों का लूणीर (तरकस) है। पूरे चित्र में, धनुष नहीं दिखता। दूसरा चित्र राम-रावण युद्ध का है। इसमें रूसी कलाकार ने, रावण को एक सिर व दस हाथ दिखाये हैं। राम व रावण दोनों भूमि पर, पैदल है। रावण के हर हाथ में, एक शस्त्र है। राम व रावण दोनों मुकुटधारी हैं, राम के पैरों में, पदभूषण-पायल है- संभवत: चित्रकार को ज्ञात नहीं था कि वनवासी राम ने, मुकुट व अलंकार धारण नहीं किए थे। चित्र में, राम के हाथों में ढाल व परशु (फरसा) है, जिससे रावण के हाथ कटकर गिर रहे हैं। चित्र में, धुनष्य बाण कहीं नहीं है। लगता है कि अधूरी जानकारी के कारण, कलाकार ने, परशुराम व राम को एक ही व्यक्ति मानकर राम के हाथ में, परशु दिया/बताया है।

उपरोक्त दोनों चित्र सोवियत विज्ञान अकादमी की प्राच्य विज्ञान (ओरिएंटो लॉनी) की भारत विद्या (इडॉलाजी) शाखा के संग्रहालय में है। इसके साथ युद्ध व मूल भारतीय संदर्भ में, राम की मूर्ति व चित्रादि, सांक्त पीतुर्सबुर्ग ( पूर्वनाम लेनिनग्राद) के संग्रहालय में है। यहां राम की मूर्ति (एकल व्यक्ति) है, धनुष्य की बनावट रामायणकालीन नहीं है। संभवत: इसे रूसी मूर्तिकार ने बनाया है, जिसे राम की पूरी जानकारी नहीं होगी।
रामकथा से जुड़े अन्य चित्र भी हरमिताज्ञ संग्रहालय में हैं। इनमें राम-लक्ष्मण द्वारा गुरूसेवा, रामपंचायतन, राम द्वारा सागर का गर्व दमन/शासन, राम लक्ष्मण सीता द्वारा नव से सरयू नदी पार करना, केवट द्वारा नाव चलाना यह चित्र है, गुरू विश्वामित्र व राम लक्ष्मण साथ में, इनके भी चित्र है, एक रामपंचायतन चित्र में, राम लक्ष्मण सीमा के मस्तक पर रामानुजपंथीय तिलक दृश्य है। लगता है किसी कलाकार ने चित्रों को प्रतिकृति बनाकर रूस में भेज दिया अन्यथा इसमें रूसी प्रभाव अवश्य दिखता।

रामकथा/रामायण को रूस में, रूसी भाषा में, पहुंचाने का महत्कार्य, अलेक्सी पेत्रोविच बाराभिकोव, नामक रूसी विद्वान ने किया। (जन्म 1890-मृत्यु 1952) उन्होंने तुलसीदासजी के रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया। उनके पुत्र आलोन बाराभिकोव भी रामचरित मानस के अध्येता रहे। अब एक भारतप्रेमी रूसी परिवार की बात ये है निकोलाई शेरिख व उनके पुत्र स्वेतोस्लाव व यूरी शेरिख। भारत में कुल्लू-मनाली मार्ग पर हाले इस्टेट में शेरिख कलावीथि है। निकोलाई शेरिख भारतप्रेमी थे, उन्होंने इच्छा प्रकट की थी कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से व उनकी समाधि पर ‘ऊँ राम’ यह अक्षर लिखे जाएं। वे भारत में राम का महत्व जानते थे।

राम की भूमिका में रूसी कलाकार गेन्नादि पेच्निकोव

पूर्व सोवियत संघ में रामायण का सफल मंचन करने का श्रेय गेन्नादि पेच्निकोव, सोवियत बाल थियेटर के अध्यक्ष, निर्देशक व अभिनेता को है। उनके अनुसार, उनके समय तक, पश्चिमी देशों ने रामायण का मंचन नहीं किया। उन्होंने लिखा है कि इस महान महाकाव्य का मंचन महत्वपूर्ण था व इसके पात्र भी श्रद्धा के पात्र हैं। इस मंचन हेतु हमें दो वर्ष श्रम करना पड़ा। भारत से मंचन हेतु विविध सामग्री जैसे रामायण के अनुवाद, कहानियां, चित्र, शस्त्रों के चित्र, मुकुटों के चित्र इत्यादि सामग्री भेजी गई। राम का अभिनय स्वयं गेन्नादि पेचनिकोव ने किया। स्त्री-पात्रों में, कैकेयी का अभिनय कठिन तो था ही, साथ में उसे दर्शकों की दृष्टि में हीन वृत्ति का व्यक्तित्व माना जाना था। ऐसी स्थिति में, गेन्नादि पेचनिकोव की पत्नी ने सीता का अभिनय किया। इस पूरे कार्य में, सोवियत संघ में भारतीय राजदूत के.पी.एस. मेनन का उच्च सहयोग मिला। 1961 में, पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मास्कों में इस नाटय का मंचन देखकर प्रसन्नता व्यक्त की।

इस तरह रामकथा/रामायण रूस पहुंची, परंतु अपना अभिनय रूसी अभिनेता/अभिनेत्रियां, ‘रूसी रामायण’ को भारत में दिखाना चाहते थे। इसमें एक कठिनाई यह थी कि अभिनेता भारतीय भाषाएं नहीं जानते थे व दर्शक रूसी भाषा नहीं जानते थे। परंतु इस कठिनाई ने स्वयं इसे हल किया। वह ऐसे कि एक तो हर पात्र ने अच्छा अभिनय किया व दूसरा यह कि रामायण भारतीय जीवन/दर्शकों में इतना गहरा पैठा है कि प्रसंग व पात्र देकर दर्शक सब समझ जाते थे। अनुवाद की आवश्यकता नहीं पड़ी। बाद में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने यह मंचन भारत में देखकर प्रसन्नता व्यक्त की (1975)। 1977 में फिर यह नाटक मंडली भारत में आई व श्रेष्ठ मंचन किया। इसके बाद रूस में इस ‘रूसी रामायण’ के मंचन को एक सिनेमा फिल्म में रूपांतरित किया गया जो आज भी कायम है।

आज जब हम अयोध्या में श्रीराम मंदिर में रामलला (राममूर्ति) की प्राण-प्रतिष्ठा करने जा रहे हैं, तब रामायण के संबंध में हम हमारे मित्र देश रूस को न भूले। इन्होंने रामकथा को रूसी जीवन में लाया, अनुवाद व मंचन व सिने-फिल्म भी बनाई व रूस-भारत की सांस्कृतिक, साहित्यिक मैत्री को दृढ़ किया। वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस से, रूस यात्रा का आमंत्रण मिला ही है-संभव है और अपेक्षा है कि 22 जनवरी 2024 के अयोध्या मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा प्रसंग रूस की ओर से कोई बधाई संदेश आए।


संदर्भ ग्रंथ-सो. संघ में भारत की छबि- ले. बोनगार्द लेबिन व वेगासिन
(लेखक रूस, रूसी भाषा व भारत-रूस संबंध के अध्येता है)

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