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36 साल पहले भी दी गई थी कुरान की आयतों को कोर्ट में चुनौती

बंगाल और केन्द्र की पूरी सरकार लग गई थी याचिका को खारिज कराने में

वसीम रिजवी ने कुरान की कुछ आयतों को सुप्रीम कोर्ट चुनौती दी है। रिजवी ने अपनी याचिका में उन 26 आयतों को कुरान से हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि इन आयतों इस्तेमाल ‘आतंकवाद, हिंसा और जिहाद फैलाने में होता है।’ रिजवी के अनुसार, प्रोफेट मुहम्मद की मृत्यु के बाद पहले तीन खलीफा ने कुरान संकलित करने में कई आयतें जोड़ दीं, ताकि उन्हें ‘युद्ध द्वारा इस्लाम के विस्तार में सहूलियत हो।’ यह चिंता पहली बार या भारत में ही नहीं है। गत वर्षों में तुर्की, सऊदी अरब और इराक में भी कुरान को लेकर संशोधन-सुधार की मांगें उठी थीं। 

हालांकि आशानुरुप मुस्लिम समाज ने रिजवी के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया दी है और उनके खिलाफ प्रदर्शन भी हो रहे हैं।

1984 के वो पत्र

लेकिन इसके पहले भी कुरान की कुछ आयतों को लेकर मामला कोलकाता उच्च न्यायालय में गया था। सबसे पहले हिमांशु किशोर चक्रवर्ती ने कुरान को प्रतिबंधित किए जाने को लेकर पश्चिम बंगाल के गृह मंत्रालय को 20 जुलाई 1984 पत्र लिखा था। उन्होंने 14 अगस्त 1984 को दूसरी बार इस मामले में पत्र लिखा था। दोनों पत्रों पर पं. बंगाल की सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बाद 29 मार्च 1985 कौ चांदमल चोपड़ा ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में इस मामले में को लेकर याचिका दायर की थी। इसे कलकत्ता कुरान पेटिशन के नाम से जाना जाता है।

चोपड़ा ने पेटिशन में ऐसी दर्जनों आयतों का हवाला दिया जिसके बारे में उनका कहना था कि ये आयतें धार्मिक आधार पर शत्रुता, घृणा और धर्मों के बीच बैर पैदा करती हैं तथा ये हिंसा के लिए उकसाती हैं…

….on grounds of religion promotes disharmony, feeling of enmity, hatred and ill-will between different religious communities and incite people to commit violence and disturb public tranquility..

पेटिशन के खिलाफ खड़ी हो गईं सरकारें

जैसे ही इस पेटिशन की खबर केन्द्र सरकार तक पहुंची तो सरकार तुरंत हरकत में आ गई। उस समय बंगाल के कांग्रेस नेता अशोक सेन केन्द्रीय कानून मंत्री थे। टेलीग्राफ में खबर प्रकाशित हुई कि कानून मंत्री और भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल इस पेटिशन पर कोई एक्शन लेंगे। इतना ही नहीं बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने इस पेटिशन को नीच हरकत बताया। इतना ही कईं लोकसभा सांसदों और मंत्रियों ने भी इस पेटिशन की आलोचना की।

पाकिस्तान ने भी भारत सरकार से कहा कि यह पेटिशन धार्मिक असिहष्णुता का उदाहरण है और भारत को धार्मिक सहिष्णुता पाकिस्तान से सीखना चाहिए ।

पेटिशन को लेकर सरकार के दृष्टिकोण को देखते हुए इस पेटिशन को मई 1985 में खारिज कर दिया गया।

18 जून को चांदमल चोपड़ा ने रिव्यू पेटिशन लगाई जिसे 21 जून को खारिज कर दिया गया। पेटिशन तो खारिज हो गई लेकिन चोपड़ के बुरे दिन शुरू हो गए।

जज पर कार्रवाई की मांग

पेटिशन की खबर सुनकर बांंग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्र में दंगे भड़क गए। इसमें इसमें 12 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका में बीस हजार लोगों ने भारतीय हाई कमिश्नर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और कार्यालय में घुसने की कोशिश की। बाद में कश्मीर और बिहार में भी दंगे भड़के। यहां तक की जम्मू कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद शाह ने श्रीनगर में एक रैली में इस याचिका का दायर करने की अनुमति देने वाले हाईकोर्ट जज पर कार्रवाई की मांग की।

चोपड़ा की गिरफ्तारी

इसके बाद चांदमंल चोपड़ा ने लेखन सीताराम गोयल के साथ मिलकर इस याचिका की पूरी कहानी एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित की। इस पुस्तक का नाम दि कलकत्ता कुरान पेटिशन है और अब तक इसके पांच संस्करण छप चुके हैं। इस पुस्तक के छपने के बाद 31 अगस्त 1987 को चांदमल चोपड़ा को गिरफ्तार कर लिया गया और सीताराम गोयल गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए। 8 सितंंबर को चोपड़ा को जमानत मिल गई। हालांकि इस किताब में चोपड़ा और गोयल ने लिखा था कि वे कुरान पर प्रतिबंध लगाए जाने के पक्ष में नहीं है। इतना ही नहीं इन्होंने लिखा कि ज्यादा से ज्यादा गैर मुस्लिमों ने इसे पढ़ना चाहिए।

ये पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। ये अब भी बाजार में उपलब्ध है।

मीडिया पर दबाव …

इस पेटिशन को मीडिया में समर्थन नहीं मिला। सही खबरें तो दूर बल्कि टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे समाचार पत्र ने तीनों लेखों की एक शृंखला प्रकाशिक की थी,स इसमें इस याचिका का विरोध किया गया था। इसमें कुरान की प्रशंसा की गई थी। इतना ही नहीं सीताराम गोयल के मुताबिक में इसमें याचिकाकर्ता का पक्ष प्रकाशित नहीं किया गया। टाइम्स के संपादक गिरीराज जैन ने इसके लिए खेद व्यक्त किया था लेकिन उन्होंने ये कभी नहीं बताया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया था।

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