जासूस शब्द अपने आप में ही रोमांचित कर देता है और खासकर बहुत जासूस जो अपने देश के लिए दुश्मन देश में खुफिया सूचनाएं एकत्रित करने के लिए जाता है। उसके चारों और दुश्मन होते हैं जिनका वह दोस्त बनकर अपने मतलब की जानकारी जुटाता है। इस तरह के जासूसों के कईं हैरतअंगेज कारनामे हैं लेकिन इनमें एक कारनामा बहुत खास है जिसमें शत्रु देश में जासूसी करने गया जासूस वहां का रक्षा मंत्री बनने के करीब पहुंच गया। इस जासूस का नाम था  एलीआहू बेन शॉल कोहेन जिन्हें एली कोहेन के नाम से जाना जाता है। 

कोहेन के कौरनामें को आप इसी से समझ सकते हैं कि उनके शव प्राप्त करने में असफल रहने पर इजराइल ने उनसे जुड़ी किसी एक चीज तो हासिल करने में जमीन आसमान एक कर दिया और 53 साल बाद उनकी वो घड़ी हासिल की जो कोहेन ने पकड़े जाते समय पहनी थी।

कोहेन के पिता सीरियाई मूल के यहूदी थे जो बाद में इजिप्ट के रास्ते इजराइल में बस गए थे। कोहेन का जन्म 1924 में इजिप्ट के अलेक्जेंड्रिया में हुआ था। उनके पिता 1914 में सीरिया के अलेप्पो को छोड़कर अलेक्जेंड्रिया इजिप्ट आ गए थे। तीन भाई और थे। 1949 में उनका परिवार इजराइल पहुंच गया लेकिन कोहेने इजिप्ट में रूके रहे और अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई पूरी की।

पहले कोहेन इजराइली सेना में भर्ती होना चाहते थे लेकिन सेना ने उन्हें नहीं लिया। 1960 मेें जब इजराइल और सीरिया के संबंधों में तनाव आने लगा तब कोहेन को सीरिया भेजने के लिए भर्ती किया गया था। इस बार कोहेन का सीरियाई बैकग्राउंड बहुत काम आया। दरअसल अंग्रेजी, अरबी और फ्रेंच भाषा की अच्छी जानकारी होने के कारण उनका चयन किया गया।

ऐसे भेजा सीरिया

छह महीने की ट्रेनिंग के बाद कोहेन काम करने के लिए तैयार हो गए। उन्हें सीधे सीरिया भेजने की बजाय अर्जेंटिना के रास्ते सीरिया भेजा गया। कोहेन को एक नया सीरियाई नाम दिया गया कामिलअमीन ताबेत। इस नाम की पहचान के साथ कोहेन सबसे पहले अर्जेंटिना में रह रहे सीरियाई समुदाय में एक व्यापारी के रूप में शामिल हुए और वहां से सीरिया में व्यवसाई की पहचान बनाकर सीरिया की राजधानी दमिश्क में रहने लगे।

कामिल बहुत हाई क्लास का जीवन जीते थे। दमिश्क में उनके घर पर आए दिन पार्टियां होती जिनमें सीरिया के बड़े -बड़े अधिकारी भी भाग लेते थे। इन्हीं सबंधों के दम पर कोहेन गोपनीय जानकारी जुटाते थे इजराइल भेजते थे। 1964 तक सीरिया की सत्ता में कोहेन की घुसपैठ इतनी हो गई कि जब वहां आमीन अल हफ्ज राष्ट्रपति बने तो उन्हें इस पद तक पहुंचाने में कोहेन की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

कोहन ने अमीन के साथ बहुत गहरी दोस्ती कर ली थी। इसके चलते अमीन कोहेन को सीरिया का उप रक्षा मंत्री बनाना चाहते थे। यहां तक कि कोहेन को ना केवल ख़ुफ़िया सैन्य ब्रीफ़िंग में मौजूद रहने का मौक़ा मिला बल्कि उन्हें गोलान हाइट्स में सीरियाई सैन्य ठिकानों का दौरा तक कराया गया। सारी महत्वपूर्ण जानकारियां लेकर कोहेन इजराइल लौट गए।अब उनका सीरिया जाने का कोई इरादा नहीं था।

आखरी बार भेजा गया सीरिया

इसके बाद इजराइल के अधिकारियों के बीच कोहेन को लेकर सहमति बन गई कि अब उन्हें सीरिया नहीं भेजा जाएगा लेकिन बाद में निर्णय हुआ कि उन्हें एक बार और सीरिया जाना होगा। कोहेन अपनी मर्जी के बिना सीरिया गए। वो जानते थे किसीरिया के खुफिया विभाग के कर्नल अहमद सुआदानी को उनके बारे मेंं शक हो गया है। सीरीयाई नेताओं की जानकारी के बिना उनके फोन टैप होने लगे थे। लेकिन उस समय इजराइल अरब युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। इसके चलते कोहने ने सीरिया जाने का जोखिम उठाया।

रंगे हाथ पकड़े गए कोहेन

जैसे ही कोहेन ने सीरिया जाने की निर्णय लिया वैसे सीरिया की खुफिया एजेंसियों को उनके आने की खबर मिल गई। एली कोहेन एक निश्चित समय पर जानकारियां इजराइल भेजने के लिए ट्रांसमीटर का उपयोग करत थे। इस ट्रांसमीटर को ट्रेक कर लिया गया और उन्हें सीरियाई एजेंसी ने रंगे हाथ पकड़ लिया। ऐसा नहीं है कि इजराइल को इसकी जानकारी नहीं थी। दरअसल इजराइल के अधिकारियों ने कोहेन को चेताया था लेकिन राष्ट्रपति के दोस्ती के चलते कोहेन बहुत लापरवाह थे, उन्हें लगता था कि उन्हें कोई नहीं पकड़ सकता। पकड़े जाने के बाद कोहेन को बहुत यातनाएं दी गईं। उन पर मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सजा हुई ।

कोहेन को साल 1966 में दमिश्क में एक सार्वजनिक चौराहे पर फांसी दी गई। उनके गले में एक बैनर डाला गया था, जिसका शीर्षक था ‘सीरिया में मौजूद अरबी लोगों की तरफ़ से। ‘

इसराइल ने पहले उनकी फांसी की सज़ा माफ़ करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया लेकिन सीरिया नहीं माना। यहां तक कि कोहेन की मौत के बाद इसराइल ने उनका शव और अवशेष लौटाने की कई बार गुहार लगाई लेकिन सीरिया ने कभी कोहेन का शव नहीं लौटाया।

इजराइल के हीरो

कोहेन इजराइल के हीरो हैं। उनका वहां पर हर की जबान पर है। 1967 में इजराइल और अरब के बीच युद्ध हुआ था। युद्ध का मकसद था नक्शे से इजरायल का नामोनिशान मिटाना। युद्ध में सीरिया जॉर्डन और इजिप्ट की सेनाएं एक तरफ थी और इजराइल अकेला एक तरफ। इजराइल ने यह लड़ाई 6 दिन में खत्म कर दी।

नक्शे पर इजराइल का नाम आज भी मौजूद है इसका मतलब यह है कि इस लड़ाई को इजराइल ने जीता था। कहा जाता है कि इजराइल को गोलान की पहाड़ियों में सीरियाई सैनिकों की मौजूदगी का पता उन युकेलिप्टस के पेड़ों से चला था जिसे कोहेन सीरिया की सेना में अपने उच्च संपर्कों को चलते वहां तैनात सैनिकों को धूप से बचाने के लिए लगवाए थे।

कोहेन की घड़ी के लिए मोसाद का अभियान

कोहेन को इजराइल में कितना सम्मान दिया इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि कोहेन का शव हासिल करने में असफल रहने के बाद इजराइल ने उनकी फांसी के 53 साल बाद उनकी उस घड़ी को हासिल किया। यह घड़ी कोहेन ने पकड़े जाते समय पहनी थी। इसके लिए मोसाद ने प्रेस कान्फ्रेंस की लेकिन यह बताया कि उन्होंने इस घड़ी को कैसे हासिल किया। केवल इतना ही कहा गया कि मोसाद ने इसके लिए एक ऑपरेशन चलाया था। संभव है कि कोहेन की तरह कोई और जासूस इसे सीरिया से लाया हो।

मोसाद के डायरेक्टर योसी कोहेन ने इसके बारे में बताया कि ये घड़ी एली कोहेन ने पकड़े जाने वाले दिन तक पहनी हुई थी और ये ‘कोहेन की ऑपरेशनल इमेज और फ़र्ज़ी अरब पहचान का अहम हिस्सा थी।’

घड़ी के मिलने पर इसराइली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने एक बयान में कहा था, “मैं इस साहसिक और प्रतिबद्धतापूर्ण अभियान के लिए मोसाद के लड़ाकों पर गर्व महसूस कर रहा हूं।”

“इस ऑपरेशन का एकमात्र उद्देश्य उस महान योद्धा से जुड़ा कोई प्रतीक इसराइल लाना था, जिसने अपने देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अहम भूमिका अदा की।”

जैसे हाथ में हाथ हो

पिछले साल मई के महीने में ये घड़ी कोहेन की विधवा नादिया को सौंपी गई थी। इस कार्यक्रम का इजराइल में टीवी पर प्रसारण किया गया। इसमें उन्होंने कहा कि “जिस पल मुझे पता चला कि ये घड़ी मिल गई है, मेरा गला सूख गया और शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई।”

नादिया ने कहा, “उस वक़्त मुझे लगा जैसे कि मैं उनका हाथ अपने हाथ में महसूस कर सकती हूं, ऐसा अहसास हुआ कि उनका एक हिस्सा हमारे साथ है।”

कोहेन की पत्नी नादिया इराकी यहूदी हैं और उनके तीन बच्चे हैं।

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