जानिए अल्फ्रेड पार्क की उस सुबह के बारे में जब आजाद शहीद हुए

चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह सुखदेव, राजगुरू से लेकर मंगल पांडे तक, ये वो नाम हैं जो भले ही देश को आजाद नहीं करा सकें हों लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के ये वो अमिट हस्ताक्षर हैं, जो कि जनमानस दिल में अंकित हैं। ये वो लोग हैं जिनके नाम से हमारे देश में नाममात्र की सड़कें और संस्थान हैं लेकिन इनकी जयंती और पुण्यतिथियों पर संवेदनाओं का ज्वार उठता है।

चन्द्रशेखर आजाद की आज पुण्यतिथि है। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में मुठफेड़ में वो शहीद हुए थे। खास बात ये है कि उनकी पिस्तौल उस अंग्रेज अधिकारी नॉट बावर को ईनाम में दी गई थी जिसने उस मुठभेड़ में पुलिस दल का नेेतृत्व किया था। बाद में भारत सरकार की बहुत कोशिशों के बाद 1973 में उस अधिकारी ने इस पिस्तौल को लौटाया था जो कि अब इलाहाबाद यानी प्रयाग के संग्रहालय में रखी है।

हू आर यू का जवाब आजाद ने गोली से दिया था

आजाद के जीवन पर लिखी विश्वनाथ वैशम्पायन की पुस्तक अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद’ के अनुसार ‘सबसे पहले पुलिस के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट विशेश्वर सिंह ने एक व्यक्ति को देखा जिसपर उन्हें चंद्रशेखर आज़ाद होने का शक़ हुआ। आज़ाद काकोरी डकैती सहित अनेक मामलों में फ़रार चल रहे थे। उन पर 5,000 रुपये का इनाम था। विशेश्वर सिंह ने अपनी शंका सीआईडी के लीगल एडवाइज़र डालचंद को बताई। वो कटरे में अपने घर वापस आये और आठ बजे सवेरे डालचंद और अपने अरदली सरनाम सिंह के साथ ये देखने गये कि ये वही आदमी है जिसपर उन्हें आज़ाद होने का शक़ है।

‘उन्होंने देखा कि थॉर्नहिल रोड कॉर्नर से पब्लिक लाईब्रेरी की तरफ़ जो फ़ुटपाथ जाता है, उस पर ये दोनों बैठे हुए हैं। जब उन्हें विश्वास हो गया कि ये आज़ाद ही हैं तो उन्होंने अरदली सरनाम सिंह को नॉट बावर को बुलवाने भेजा, जो पास में एक नंबर पार्क रोड में रहते थे। ‘

इस बारे में अंग्रेज सरकार द्वारा जारी किए गए प्रेस नोट में अंग्रेज अधिकारी नॉट बावर से हवाले से कहा गया था कि

ठाकुर विशेश्वर सिंह से मेरे पास संदेश आया कि उन्होंने एक व्यक्ति को एल्फ़्रेड पार्क में देखा है जिसका हुलिया चंद्रशेखर आज़ाद से मिलता है। मैं अपने साथ कॉन्स्टेबल मोहम्मद जमान और गोविंद सिंह को लेते गया। मैंने कार खड़ी कर दी और उन लोगों की तरफ़ बढ़ा। क़रीब दस गज़ की दूरी से मैंने उनसे अंग्रेजी में पूछा कि हू आर यू ? जवाब में जवाब में आजाद ने पिस्तौल निकालकर मुझपर गोली चला दी। ‘

‘मेरी पिस्तौल पहले से तैयार थी। मैंने भी उस पर गोली चलाई। जब मैं मैग्ज़ीन निकालकर दूसरी भर रहा था, तब आज़ाद ने मुझपर गोली चलाई, जिससे मेरे बाएं हाथ से मैग्ज़ीन नीचे गिर गई। तब मैं एक पेड़ की तरफ़ भागा।

आजाद ने पहचान करने वाले विशेश्वर सिंह को जबड़े में गोली मारी

पुलिस अधिकारी बावर ने इस मुठभेड़ के बारे में आगे बताया कि मेरे हाथ से मैग्जीन गिर जाने के बाद इसी बीच विशेश्वर सिंह रेंगकर झाड़ी में पहुँचे। वहाँ से उन्होंने आज़ाद पर गोली चलाई। जवाब में आज़ाद ने भी गोली चलाई जो विशेश्वर सिंह के जबड़े में लगी। ‘

‘जब-जब मैं दिखाई देता आज़ाद मुझपर गोली चलाते रहे। आख़िर में वो पीठ के बल गिर गये। इसी बीच एक कॉन्स्टेबल एक शॉट-गन लेकर आया, जो भरी हुई थी। मैं नहीं जानता था कि आज़ाद मरे हैं या बहाना कर रहे हैं। मैंने उस कॉन्स्टेबल से आज़ाद के पैरों पर निशाना लेने के लिए कहा। उसके गोली चलाने के बाद जब मैं वहाँ गया तो आज़ाद मरे हुए पड़े थे और उनका एक साथी भाग गया था।

अफसर की गाड़ी में आजाद की गोली से हुई तीन छेद

यह सुनिश्चित कर लेने के बाद की आजाद मर चुके हैं, पुलिस ने उनकी तलाशी ली। उनके पास से 448 रुपए नकद मिले साथ ही 16 कारतूज भी बरामद हुए। चारों तरफ पेड़ पर गोलियों के निशान थे और यहां तक जिस गाड़ी से पुलिस अधिकारी नॉट बावर मौके पर पहुंचे थे, उसमें भी आजाद ने तीन गोलियां मारी थी और इन गोलियों से इस गाड़ी में तीन छेद हो गए थे। गोलियों की आवाज पास के ही हिन्दू होस्टल तक पहुंची। वहां के छात्रों को जब पता चला कि आजाद मुठभेड़ में शहीद हो गए हैं, तो वे अल्फ्रेड पार्क में जमा हो गए।

पुलिस कप्तान मेजर्स भी वहाँ पहुँच चुके थे. उन्होंने छात्रों से तितर-बितर होने के लिए कहा, लेकिन कोई भी वहाँ से नहीं हिला। कलक्टर ममफ़ोर्ड भी वहाँ मौजूद थे। कप्तान मेजर्स ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोली चलाने की अनुमति माँगी, लेकिन कलक्टर ने अनुमति नहीं दी।

ब्राह्मण पुलिस वालों से ही आजाद के शव को उठवाया गया

विश्वनाथ वैशम्पायन ने लिखा है कि ‘आज़ाद का शव चूँकि भारी था, इसलिए उसे स्ट्रेचर पर नहीं रखा जा सका। चंद्रशेखर आज़ाद चूँकि ब्राह्मण थे, इसलिए पुलिस लाइन से ब्राह्मण रंगरूट बुलवाकर उन्हीं से शव उठवाकर लॉरी में रखा गया था।’

आज़ाद के शरीर का पोस्टमार्टम सिविल सर्जन लेफ़्टिनेंट कर्नल टाउनसेंड ने किया था । उस समय दो मजिस्ट्रेट ख़ान साहब रहमान बख़्श क़ादरी और महेंद्र पाल सिंह वहाँ मौजूद थे।

आज़ाद के दाहिने पैर के निचले हिस्से में दो गोलियों के घाव थे। गोलियों से उनकी टीबिया बोन भी फ़्रैक्चर हुई थी।

तुरंत कराया गया अंतिम संस्कार

अग्रेज सरकार को आजाद की लोकप्रियता का अंदाजा था। इसके चलते पोस्टमार्टम के तुरंत बाद उनका अंतिम संस्कार रसूलाबाद में करा दिया गया। आजाद के शहीद होने की खबर कमला नेहरू को मिली तो वे भी पुरषोत्तम दास टंडन के साथ वहां पहुंची। वे आजाद को अपना भाई मानती थीं। लेकिन उनके वहां पहुंचने तक अंतिम संस्कार हो चुका था। आजाद के रिश्तेदार शिव विनायक मिश्र आजाद की अस्थियों को इलाहाबाद लाए।

प्रयागराज अस्थियों का जुलूस निकाला गया। उस दिन प्रयाग में हड़ताल रही। हजारों लोग जुलूस में शामिल हुए। अस्थियों पर फूल बरसाए गए। जुलूस एक पार्क में समाप्त हुआ। वहां पर पुरषोत्तमदास टंडन, कमला नेहरू, मंगल देव सिंह और शचींद्र सान्याल की पत्नी प्रतिमा सान्याल के भाषण हुए। आज़ाद की अस्थियों में से एक अंश समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव भी ले गए थे और विद्यापीठ में जहाँ आज़ाद के स्मारक का पत्थर लगा है, उन्होंने उस अस्थि के टुकड़े को रखा।

भगत सिंह का पीछा कर रहे पुलिस वाले को होस्टल से ही गोली मारी थी आजाद ने

चन्द्रशेखर आजाद के बारे में प्रसिद्ध है कि उनका निशाना अचूक था। चंद्रशेखर आज़ाद के साथी रहे शिव वर्मा अपनी क़िताब ‘रेमिनेंसेज़ ऑफ़ फ़ेलो रिवोल्यूशनरीज़’ एक घटना के बारे में लिखा है कि 17 दिसंबर, 1927 को अंग्रेज़ डीएसपी जॉन साउन्डर्स को मारने के बाद जब भगत सिंह और राजगुरु डीएवी कॉलेज के हॉस्टल की ओर भाग रहे थे, तो एक पुलिस हवलदार चानन सिंह उनके पीछे दौड़ रहा था।

हॉस्टल से सारा नज़ारा देख रहे चंद्रशेखर आज़ाद को ये अंदाज़ा हो गया था कि भगत सिंह और राजगुरु ने अपनी पिस्तौल की सारी गोलियां साउन्डर्स पर खाली कर दी है और उनके पास गोलियाँ नहीं बची हैं।

, ‘ये ज़िदगी और मौत की दौड़ थी और दोनों के बीच का फ़ासला धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। भागते हुए चानन सिंह की बाहें भगत सिंह को बस पकड़ने ही वाली थीं। लेकिन इससे पहले कि चानन सिंह ऐसा कर पाते एक गोली उनकी जाँघ के पार निकल गई। वो गिर पड़े और बाद में ज़्यादा ख़ून निकल जाने से उनकी मौत हो गई. ये गोली अपनी माउज़र पिस्तौल से चंद्रशेखर आज़ाद ने चलाई थी। ‘

अंग्रेज अधिकारी ने भी माना था कि उन्होंने आजाद जैसा निशानेबाज कभी नहीं देखा। वो ये भी कहते थे कि यदि आजाद के पैर में गोली नहीं लगती तो उस दिन कुछ भी हो सकता था क्योंकि आजाद की गोली नॉट बावर को लग चुकी थी।

वो जामुन कटवा दिया गया

जिस पेड़ के नीचे आज़ाद मारे गए थे, वो तीर्थ बना गया था। वहाँ दिन भर लोगों की भीड़ लगने लगी थी। लोग वहाँ फूलमालाएं चढ़ाने और दीपक जलाने लगे थे। इसके चलते अंग्रेज सरकार ने रातोंरात उस पेड़ को जड़ से काटकर उसका नामोनिशान मिटा दिया और ज़मीन बराबर कर दी। यहां तक कि उसकी लकड़ी को लॉरी से उठवाकर कहीं और फिकवा दिया गया।

बाद में आज़ाद के चाहने वालों ने उसी जगह पर जामुन के एक और पेड़ का वृक्षारोपण किया और जिस मौलश्री के पेड़ के नीचे नॉट बावर खड़े थे, उस पर आज़ाद की गोलियों के निशान लंबे समय तक मौजूद रहे।

कुछ दिनों के बाद भगत सिंह को हो गई फांसी

आजाद के शहीद होने के कुछ दिनों के बाद ही 23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को भी फांसी दे गई। इसके साथ ही इन लोगों के संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिक सोशलिस्टआर्मी भी खत्म हो गई। हालांकि बहुत कम समय में इस संगठन ने जो किया वो ऐतिहासिक था। पीढ़ियों तक इन शहीदों की कहानियां याद रहेंगी।

error: Content is protected !!