24th June 2022

वो भाजपा नेता जिस पर बाबरी ढांचा ढहने के बाद एक दिन में दर्ज हुए थे 76 केस

कुछ महीनों बाद हो गयी थी काला बच्चा सोनकर की हत्या

कानपुर

काला बच्चा नाम कानपुर और यूपी के लिए अनजान नहीं हैं। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा ढहने के बाद अगले दिन कानपुर में मुस्लिम समाज ने विरोध मार्च निकाला था। इसके बाद वहां हिंसा भड़क गई थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह 6 दिसंबर को ही त्यागपत्र दे चुके थे, यूपी राष्ट्रपति शासन था। प्रशासन ने इस मामले में भाजपा के युवा नेता काला बच्चा सोनकर पर एक दिन में 76 केस दर्ज किए थे। 

काला बच्चा सोनकर का वास्तविक नाम मुन्ना सोनकर था, लेकिन उन्हें उनके सांवले रंग के कारण प्यार से काला बच्चा बोलते थे। यही नाम उनकी पहचान बन गया। भाजपा ने 1993 में विधानसभा चुनाव में उन्हें बिल्हौर सीट से प्रत्याशी बनाया। वे अंतिम दौर के पहले तक बढ़त बनाए रहे लेकिन आखिरी दौर में समाजवादी पार्टी के शिव कुमार बेरिया से 682 वोटों से चुनाव हार गए। इसके 2 महीने बाद कानपुर के भरे बाजार में बम मारकर उनकी हत्या कर दी गई।

सरकार और प्रशासन ने मिलकर उनके शव को न तो भाजपा के पार्टी कार्यालय पर लाने दिया और ना ही उनके घर पर। उनके परिवार के सात सदस्यों की उपस्थिति में तड़के उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। जब उनकी अस्थियां एकत्रित की गई थी तो चिता की राख से 40 रिपीट मिली थी जो कि बम हमले के चलते उनको शरीर में घुसी थी । घटना को 29 वर्ष हो चुके हैं लेकिन कानपुर आज भी काला बच्चा को याद करता है। 

29 साल बाद जैसे खुद लड़ रहे हो चुनाव

इस बार भारतीय जनता पार्टी ने बिल्हौर सीट से काला बच्चा के बेटे राहुल को प्रत्याशी बनाया है। युवा राहुल B.Ed करने के बाद शिक्षक बनने की तैयारी में थे लेकिन उनके चाचा उन्हें राजनीति में ले आए और पार्टी ने अब उन्हें बिल्हौर से मैदान में उतार दिया है। राहुल के हर पोस्टर में उनके पिता काला बच्चा मौजूद हैं। 1993 के चुनाव में मतदाता रहे लोग आज भी उन्हें याद करते हैं। राहुल अपना नाम है राहुल काला बच्चा लिखते हैं जबकि उनका वास्तविक नाम मोहित सोनकर है। घर में उन्हें राहुल बोला जाता है। 

हत्या के लिए मुंबई से आई थी सुपारी

काला बच्चा की हत्या के बाद जो आरोपी पकड़े गए थे उनके जरिए पता चला कि काला बच्चा की हत्या के लिए मुंबई से 10 लाख रुपए की सुपारी कानपुर दी गई थी। इनमें से चार लाख रुपये हत्यारों को देकर उनकी हत्या कराई गई। संभव था कि उनकी हत्या के पीछे फाइनेंसर के रूप में भी वही लोग हैं जो मुंबई बम ब्लास्ट के आरोपी रहे हैं यानी कि दाऊद इब्राहिम गैंग। इसके पीछे पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई का हाथ होने की भी चर्चा थी।

हत्या के बाद कानपुर के कई थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू भी लगाना पड़ा था। हत्या की सूचना मिलने के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय से ब्रह्मदत्त द्विवेदी कानपुर आए थे। उन्होंने ही प्रशासन और पुलिस से बात कर काला बच्चा का शव पार्टी कार्यालय और परिवार तक लाने की व्यवस्था की थी लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं होने दिया। यहां तक की काला बच्चा के परिवार पर लाठीचार्ज भी हुआ था। 

हत्यारों की भी हुई हत्या

काला बच्चा की हत्या में आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से कुछ उनके इलाकों के मुस्लिम भी थे। इन आरोपियों में से तीन की कुछ समय बाद हत्याएं हो गईं। केवल एक जावेद अभी जीवित है लेकिन उसे पैरालिसिस हो गया है। काला बच्चा के निजी सचिव गिरीश वाजपेई थे। काला बच्चा की हत्या के बाद जो हिंसा भड़की थी उसमें एक मुस्लिम युवक की हत्या के मामले में गिरीश को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उम्रकैद की सजा भी सुनाई थी। लेकिन गिरीश को हाईकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। 

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