28th November 2022

बिहार के दो पीएचडी डॉन, एक ने दी थी मुख्तार अंसारी की सुपारी तो दूसरे ने की थी मंत्री की हत्या

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एक ने की है महावीर स्वामी पर पीएचडी तो दूसरे ने हिन्दी उपन्यासों में राजनीतिक चेतना पर, दोनों रहे हैं कई बार विधायक

गूंज रिपोर्टर, पटना

बिहार में चुनाव चल रहे हैं और साथ ही बाहुबलियों की तैयारी भी। बाहुबली भी ऐसे वैसे नहीं, वो जो मुख्यमंत्री को भी कुछ नहीं समझते और कलेक्टर की तो हत्या कर चुके हैं। लेकिन इतने “इंटेलिजेंट” हैं कि पीएचडी भी करके अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाए धूम रहे हैं । ये और बात है कि ये मेडिकल डॉक्टरों का अपहरण कर रंगदारी भी वसूलने के आरोप झेल रहे हैं।

पहला नाम है नरेन्द्र पांडे उर्फ सुनील पांडे, माफ कीजिए डॉ. सुनील पांडे। तीन बार के विधायक हैं। रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उपाध्यक्ष थे और तरारी विधानसभा से फिर चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन यहां से भाजपा प्रत्याशी के मैदान में होने के चलते एलजेपी यहां से किसी को भी टिकट नहीं दे रही है तो पांडे जी ने पार्टी छोड़ दी है। अब वे निर्दलीय मैदान संभालेंगे। लेकिन केवल इतने से ही आप सुनील पांडे को न जान सकते हैं और न समझ सकते हैं। इसके लिए आपको फ्लेशबैक में जाना पड़ेगा तभी आप उनकी सही हैसियत का अंदाजा लगा सकेंगे।

1990 का समय था। जब पांडे जी को उनके इंजीनियर पिता कमलेशी पांडे ने, जो कि सोन नदी से रेत निकालने के ठेके लेते थे, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बैंगलोर भेजा। वहां पांडे जी ने विवाद में अपने एक सहपाठी को चाकू मार दिया और बिहार के लिए भाग लिए। वे रोहतास जिले के अपने गांव नवाडीह पहुंचे। पहले अपराध में जेल न जाने और अपने रेत के ठेकेदार पिता की दबंग छवि के साये में उन्होंने अपराध की दुनिया में प्रवेश के लिए सिल्लू मियां को अपना गुरू बनाया। सिल्लू मियां सीवान के बाहुबली शहाबुद्दीन के दायें हाथ थे और पांडे जी सिल्लू मियां के दायें हाथ।

एक दिन अचानक सिल्लू मियां की हत्या हो गई। बताया जाता है कि पांडे जी हाथ बने हुए तंग आ गए थे और अब वे गैंग का सिर (Head) बनना चाहते थे। इस हत्या में उनका नाम आया लेकिन न कोई सबूत मिले और न ही कोई केस दर्ज हुआ।

बिहार में वो समय रनवीर सेना का था। पांडे जी भी भूमिहार थे और रनवीर सेना भी प्रमुख रूप से भूमिहारों की थी। बिहार के उस इलाके में कोई भी भूमिहार परिवार ऐसा नहीं था जिसने रनवीर सेना में किसी तरह का कोई योगदान न दिया हो। पांडे जी के परिवार ने भी रनवीर सेना की मदद की थी। रनवीर सेना पर ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया का कब्जा था। पांडे जी मुखिया से साथ हो गए। वे यहां भी मुखिया के दाहिने हाथ थे। पांडे जी रनवीर सेना के कमांडर हो गए। लेकिन 1993 में एक ईंट भट्‌टा मालिक की हत्या हो गई। इस हत्या के पीछे पांडे जी थे जबकि वो ईंट भट्‌टा मालिक मुखिया का करीबी था। इससे दोनों के बीच दुश्मनी हो गई।

बदला लेने के लिए 10 जनवरी 1997 को भोजपुर के तरारी प्रखंड के बागर गांव में ब्रह्मेश्वर मुखिया गुट ने 3 लोगों की हत्या कर दी। मारे गए सभी लोग भूमिहार जाति के ही थे। मरने वालों में एक महिला भी थी, जो सुनील पांडे की करीबी रिश्तेदार थी।

फिर इस दुश्मनी का सीज फायर 2012 में ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया की हत्या के साथ ही हुआ। इस हत्या में भी पांडे जी का नाम आया लेकिन एक बार फिर सबूत नहीं मिले और पांडे जी बच गए। कहा जाता है कि मुखिया और पांडे जी के बीच विवाद का कारण रनवीर सेना का चंदा था।

इस हत्या के पहले ही 2000 में पांडे जी नेता बन चुके थे। वे नीतीश और जार्ज की समता पार्टी के टिकट पर विधानसभा पहुंचे थे। इन चुनाव के बाद नीतिश कुमार सात दिन के मुख्यमंत्री बने थे। भाजपा और समता पार्टी के पास बहुमत नहीं था। उस समय पांडे जी अपना राजनीतिक कौशल या यूं कहिए बाहुबली सर्कल का उपयोग कर अन्य बाहुबली विधायकों जैसे मोकामा के अनंत सिंह, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला , धूमल सिंह और रामा सिंह को नीतिश के पाले में किया था। सरकार तो नहीं बची लेकिन पांडे जी नीतिश की नजर में चढ़ गए। वे इसके बाद नेता मान लिए गए लेकिन उनकी कुछ हरकतें जारी रहीं।

2003 में पटना में एक न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर रमेश चंद्रा का अपहरण कर पचास लाख रुपए की फिरौती मांगी गई। लेकिन पुलिस ने पटना के नौबतपुर इलाके से डॉक्टर चंद्रा को बरामद कर लिया। केस में नाम आया पीरो के विधायक सुनील पांडे का। वे उस समय समता पार्टी के विधायक थे और सरकार लालू की थी। केस दर्ज हुआ और फिर 2008 में सुनील पांडे को इस अपहरण के मामले में तीन और लोगों के साथ उम्रकैद की सजा हुई। मामला हाई कोर्ट पहुंचा और फिर हाई कोर्ट ने सुनील को इस मामले में बरी कर दिया।

लेकिन तब तक सुनील पांडे 2005 में एक बार फिर से जेडीयू के टिकट पर पीरो से लगातार तीसरी बार विधायक बन गए थे। क्योंकि 2005 में फरवरी और नवंबर दो बाकर विधानसभा के चुनाव हुए थे। फरवरी में सुनील पांडे ने राजद कोटे से मंत्री रह चुकीं कांति सिंह के पति केशव सिंह को हराया था, जबकि नवंबर में उन्होंने राजद प्रत्याशी त्रिवेणी सिंह को हराकर विधानसभा पहुंचे थे।

2010 के चुनाव के समय नीतिश कुमार को अचानक पता चला कि पांडे जी के खिलाफ लूट, रंगदारी, डकैती, हत्या की कोशिश और अपहरण के 23 मामले दर्ज थे। उस समय उन्हें लगा कि पांडेजी बाहुबली हैं। हालांकि उनके रिश्ते सुशासन बाबू से मधुर बने रहे। फिर आए 2014 के लोकसभा चुनाव। नीतिश एनडीए छोड़कर अकेले लड़ने की तैयारी में थे। पांडे जी ने अपने राजनीतिक ज्ञान के आधार पर उन्हें ऐसा करने से मना किया लेकिन वे नहीं माने और लोकसभा में दो सीटों पर सिमट गए। इसके बाद पांडे जी ने नीतिश को छोड़ रामविलास पासवान की एलजेपी के जरिए एनडीए में एंट्री कर ली।

मुख्तार अंसारी की सुपारी

23 जनवरी, 2015 को आरा के सिविल कोर्ट में एक बम ब्लास्ट हुआ था। ये आत्मघाती हमला था, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी। इस दौरान कोर्ट से दो कैदी फरार हो गए लंबू शर्मा और अखिलेश उपाध्याय। दरअसल ये ब्लास्ट इन दोनों को फरार कराने के लिए ही किया गया था। जब केस की तफ्तीश शुरू हुई तो पता चला कि इस धमाके को अंजाम देने वाला लंबू शर्मा ही था, उसने अपनी महिला मित्र नगीना का मानव बम के रूप में उपयोग किया था।

24 जून, 2015 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने लंबू शर्मा को गिरफ्तार कर किया। जब उससे पूछताछ हुई तो उसने बताया कि जेल से फरार होने में उसकी मदद सुनील पांडे ने की थी। इसके बाद भोजपुर जिले के एसपी नवीन चंद्र झा ने सुनील पांडे को एसपी ऑफिस में बुलाया। सुनील पांडे पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस को लंबू शर्मा ने बताया कि उसने यूपी के बाहुबली मुख्तार अंसारी को मारने के लिए 50 लाख रुपये की सुपारी ली थी। ये सुपारी उसे पांडे जी ने ही दी थी। लंबू के मुताबिक मुख्तार अंसारी को मारने के लिए बृजेश सिंह ने छह करोड़ रुपये की सुपारी दी थी। कभी मुख्तार के करीबी रहे चांद मियां की मदद से लंबू ने मुख्तार की रेकी भी कर ली थी। मुख्तार को मारने के लिए सुनील पांडे ने उसे 50 लाख रुपये भी दिए थे और जेल से भागने में मदद भी की थी। लंबू के बयान के बाद सुनील पांडे गिरफ्तार तो हुए, लेकिन तीन महीने में ही उन्हें जमानत मिल गई। हां लंबू को इस मामले में कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई है।

2015 में आर के सिंह ने रुकवाया पांडे का टिकट

आरा के सांसद आरके सिंह के कहने पर रामविलास पासवान ने 2015 के विधानसभा चुनाव में पांडे जी का टिकट काट दिया था लेकिन वे भी पांडे जी की उपेक्षा नहीं कर पाए और उनके बदले में परिसीमन में नई बनी सीट तरारी से उनकी पत्नी गीता पांडे को टिकट दे दिया। गीता केवल 272 वोटों के अंतर से चुनाव हार गईं। अब सुनील पांडे इस सीट से स्वयं चुनाव लड़ना चाहते हैं।

जेल में पीएचडी हो गए पांडे जी

पत्नी विधायक नहीं बन सकीं और भाई हुलास पांडे भी एमएलसी नहीं रहे। इस दौरान पांडे जी ने पीएचडी पूरी कर ली। वे महावीर स्वामी और उनकी अहिंसा पर थीसीस लिख चुके हैं। पीएचडी अवॉर्ड हो चुकी है और अब वे डॉ. सुनील पांडे हो गए हैं। वे पहले ही इतिहास में एमए कर चुके हैं। वे गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। आरा के वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के मुखिया रामजी राय उनके पीएचडी गाईड थे। जेल में रहते हुए उन्होंने पीएचडी का इंटरव्यू भी दिया था। जिसके लिए वो हथियारबंद पुलिसवालों के साथ इंटरव्यू टीम के सामने एक घंटे तक बैठे रहे थे। इसके लिए पांडे जी ने कोर्ट में याचिका लगाकर विशेष अनुमति ली थी। डॉ. पांडे फिर विधानसभा जाने के लिए तैयार हैं।

डॉ. मुन्ना शुक्ला जिनके लिए जेल में भी होते थे मुजरा

मुन्ना शुक्ला की कहानी पढ़कर आप गैंग्स ऑफ वासेपुर को भूल जाएंगे। उत्तर बिहार के मुजफ्फपुर के निवासी मुन्ना शुक्ला 2000 से लालगंज विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। बिहार में इनके नाम दो चर्चित हत्याकांड दर्ज हुए। एक गोपालगंज के कलेक्टर की हत्या और दूसरा पटना में मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या। नाम बनाने के लिए ये दो कांड काफी हैं। मुन्ना के भाई छोटन शुक्ला भी बाहुबली थे और 1995 में होने वाले विधानसभा चुनाव में वे आनंद मोहन सिंह की बिहार पीपुल्स पार्टी की ओर से केसरिया विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे।

Munna Shukla

छोटन शुक्ला की 1994 में हत्या हो गई थी। केसरिया में प्रचार करने के बाद एम्बेसेडर कार से छोटन घर लौट रहे थे। रात 8 से नौ बजे के बीच उनकी गाड़ी शहर के संजय सिनेमा हॉल के पास पहुंची जहां पुलिस की वर्दी में कुछ लोगों ने रुकने का इशारा दिया। गाड़ी रुकते ही बर्स्ट फायर से पूरा इलाका थर्रा उठा। मिनटों में छोटन शुक्ला समेत पांच लोग गोलियों से भून डाले गए। जिसका आरोप मंत्री बृजबिहारी प्रसाद पर भी लगा था। छोटन शुक्ला के छोटे भाई भुटकुन शुक्ला ने बदला लेने की कसम खाई।

 भुटकुन की नजर बृजबिहारी प्रसाद पर थी। इसकी भनक बृजबिहारी को लग चुकी थी। लालू ने सामान्य पुलिस के अलावा कमांडो की तैनाती उनके सुरक्षा घेरे में कराई। ओंकार सिंह बृजबिहारी का दाहिना हाथ था और वो भी खुद शार्पशूटर था। ओंकार ठेके भी लेता था और बृजबिहारी का मनी मैनेजमेंट भी करता था। एक सटीक सूचना पर भुटकुन ने जीरो माइल पर उसे घेर लिया। कहा जाता है कि लगभग एक दर्जन एके 47 से 400 राउंड फायरिंग हुई। ओंकार के साथ उसके छह साथी मारे गए। ये बदले का पड़ाव था। बृजबिहारी का नंबर बाकी था लेकिन इसके पहले ही भुटकुन की हत्या हो गई।

भुटकुन के बॉडीगार्ड दीपक सिंह ने ही उसकी जान ले ली। इसमें भी एके-47 का इस्तेमाल हुआ। दो भाइयों की हत्या के बाद विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला ने बृजबिहारी से बदला लेने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।

इसके पहले छोटन की शवयात्रा में भीड़ प्रदर्शन कर रही थी। उसी समय गोपालगंज के कलेक्टर जी कृष्णैया की गाड़ी वहां पहुंची और भीड़ में फंस गई। छोटन की हत्या से गुस्साई भीड़ ने पीट-पीटकर कलेक्टर की हत्या कर दी, जिसका सीधा आरोप मुन्ना शुक्ला और आनंद मोहन पर लगा। मुन्ना इस मामले में बरी हो गए वहीं आनंद मोहन अभी इसी मामले में सजा काट रहे हैं और जेल में गौतम बुद्ध पर किताब लिख रहे हैं।

इसका बाद आया मंत्री बृजबिहारी प्रसाद का नंबर। मंत्री बृजबिहारी प्रसाद इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा घोटाले में फंस गए थे। लालू यादव को सीबीआई जांच करानी पड़ी। गिरफ्तारी से बचने के लिए बृजबिहारी ने बीमारी का बहाना बनाया और वो पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान यानी आईजीआईएमएस में भर्ती हो गए। वहीं पर उनका काम तमाम करने की तैयारी की गई।

13 जून 1998 को शाम आठ बजे के आस-पास बृजबिहारी प्रसाद बॉडी गार्ड्स के साथ अस्पताल में टहल रहे थे। एक एम्बेसेडर कार अस्पताल परिसर में बृजिबहारी से बीस कदम दूर रूकी और चंद मिनटों में इसमें बैठे लोग मंत्रीजी पर बर्स्ट फायर करते हैं। एके 47 की तड़तड़ाहट किसी को संभलने तक का मौका नहीं देती। बृजबिहारी के साथ एक बॉडीगार्ड और दो अन्य लोगों की खून से लथपथ लाश वहीं सड़क पर गिर जाती है। कहा जाता है कि ये हत्या खुद श्रीप्रकाश शुक्ला ने की।

इसमें सूरजभान, मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी समेत आठ लोगों को निचली अदालत ने दोषी करार दिया लेकिन 2014 में हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। श्रीप्रकाश शुक्ला का तो इस हत्याकांड के तीन महीने बाद ही यूपी पुलिस की एसटीएफ ने एनकाउंटर कर दिया था। निचली अदालत से सजा मिलने के बाद जब मुन्ना शुक्ला जेल में थे उसी समय उनके मन में हिन्दी में रिसर्च करने का विचार आया और वे पीएचडी पाकर डॉ. मुन्ना शुक्ला हो गए।

डॉ. मुन्ना ने जेल में केवल पीएचडी ही नहीं की बल्कि वे जेल के अंदर बार बालाओं का डांस देखने व उनके साथ नाचने के फोटो वाइरल हो जाने की वजह से भी चर्चा रहे हैं। एक मामले में सजा हो जाने के चलते अब शुक्ला चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। इसके चलते वे लालगंज से अपनी पत्नी अन्नू शुक्ला को चुनाव लड़ाना चाहते हैं लेकिन नीतिश कुमार ने यह सीट भाजपा को दे दी है। इसके चलते डॉ. शुक्ला ने नीतिश को धोखेबाज कहते हुए अपनी पत्नी को निर्दलीय लालगंज से चुनाव मैदान में उतारने की घोषणा कर दी है।

बिहार में सैयद शहाबुद्दीन नाम के एक और बाहुबली हैं। वे भी पीएचडी हैं लेकिन उनके बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी है।

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