5th December 2022

Online Classes से अकेलेपन की ओर बढ़ रहे बच्चे

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बच्चों के व्यवहार में हो रहे बदलाव, डिप्रेशन का भी खतरा

कोरोना काल की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक मार बच्चे झेल रहे हैं। उनके स्कूल बंद हैं। खेलकूद जैसी फिजीकल एक्टिविटी भी बंद हैं। वे घर में रह रहे हैं और यही उनके लिए सबसे कठिन काम है। देर-सबेर कोरोना चला जाएगा लेकिन डर है कि यह बच्चों के व्यवहार पर अपना स्थाई असर न छोड़ जाए। ऑनलाइन क्लासेस चल रही हैं। लेकिन इसे लेकर राहत कम और चिंता ज्यादा हो रही। यह बच्चों को सोशल होने की बजाय लोनली होना सिखा रही है। वहीं माता-पिता को डर है कि बच्चे अभी पढ़ाई के नाम से ऑनलाइन हैं लेकिन बाद वे इसे ही जीवन न समझ लें।

बदल गया है आठ साल का अनमोल

अनमोल आठ साल का है और वो बेहद सोशल है। यानी कि उसकी दोस्ती अपनी कॉलोनी के हर घर में है। वो स्कूल बहुत खुशी-खुशी जाता है क्योंकि वहां भी उसे अपने दोस्तों के साथ पढ़ने का मौका मिलता है। लॉकडॉउन के बाद उसे समझाने में माता-पिता को अच्छी खासी मशक्कत करना पड़ी। उसे घर में रुकने की आदत नहीं थी। लेकिन उसे यह आदत डालनी पड़ी। अब उसकी ऑनलाइन क्लासेस चल रही हैं। शुरुआत में उसे इसमें भी बहुत बोरियत होती थी। लेकिन अब उसे इसकी भी आदत हो गई है। 30-30 मिनट की दो क्लासेस के बाद भी वह मोबाइल नहीं छोड़ता है। अब वह इसे एक ऐसा मैजिक बॉक्स समझता है जिसमें दुनिया की हर चीज समाई हुई है।

अकेलेपन की ओर बढ़ रहे बच्चे

उसके माता-पिता की समस्या इतनी ही नहीं है। उसके व्यवहार में बदलाव भी उनके लिए बड़ी समस्या है। अब जबकि लॉकडाउन खुल चुका है। बच्चे बाहर खेलने भी जाने लगे हैं लेकिन अनमोल अब बाहर नहीं जाता है। अब वह ज्यादातर समय अकेले ही बिताता है। ऐसा करने वाला वो अकेला नहीं है। उसके कईं साथी अब इसी तरह हो गए हैं। ऐसे में माता-पिता को लगता है कि उसका यह व्यवहार उसके लिए बड़ी मानसिक परेशानी खड़ी कर सकता है। उन्हें डर लगता है कि वो अकेले रहते-रहते डिप्रेशन का शिकार न हो जाए। उसकी मां कहती है कि मुझे लगता है कि वे लोग जो सोशल नहीं होते हैं वे इस तरह की मानसिक स्थिति का शिकार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि जिन लोगों के ज्यादा दोस्त होते हैं वे जीवन में कभी अकेलापन नहीं महसूस करते हैं। इस तरह के लोग सफल भी ज्यादा होते हैं।

मूड़ी हो रहे हैं बच्चे

ऑनलाइन क्लासेस में कोई अनुशासन नहीं होता है, साथ ही बच्चे न तो सीधे शिक्षक के संपर्क में रहते हैं। इसके चलते कोई अनुशासन का भी डर नहीं होता है। ऐसे में बच्चे मूडी हो रहे हैं। उनकी मन:स्थिति भी थोड़े-थोड़े समय में बदल जाती है। इस मूड स्विंग को मनोविज्ञानी भी स्वीकार करते हैं।

लैपटॉप और मोबाइल के स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों में अकेलेपन और चिंतित होने की स्थिति ला सकती है। यदि यह स्थिति आगे बढ़ती है तो डिप्रेशन का रूप ले सकती है। इसके चलते बच्चों में नाखून काटने, अंगूठा चूसने और बार-बार बालों में हाथ घुमाने जैसी आदतें भी विकसित हो सकती हैं।

-प्रो. आदर्श कोहली, क्लिनिकल साइकोलॉजी,

बहुत मार्केटिंग हुई ऑनलाइन क्लासेस की

स्कूलों ने ऑनलाइन क्लासेस की मार्केटिंग इस तरह से की है जैसे कि यह कोरोना सहित सभी मर्जों की दवा है। इसके पक्ष में बहुत से सकारात्मक तर्क भी स्थापित किए गए। लेकिन मूल रूप से यह केवल शैक्षणिक संस्थानों के फील वसूलने का हथियार साबित हुआ है। व्यवहारिक रूप से यह उतना कारगर नहीं है। लेकिन यदि ऑनलाइन क्लासेस नहीं होती तो शैक्षणिक संस्थान फीस कैसे वसूलते?

यहां तक कि कॉलेज स्टूडेंट भी इसे लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं क्योंकि ऑनलाइन क्लासेस में बहुत सारा डाटा लगता है। वे संस्थान को फीस भी भरें और इंटरनेट का खर्च भी बढ़ाए, दोनों काम उन्हें पसंद नहीं आ रहे हैं। वे इससे बचने की कोशिश करते हैं। छात्र नमन सिंह ने बताया कि ऑनलाइन क्लासेस से बेहतर है कि हम खुद ही किताबें पढ़ें और समस्याएं छांट लें। इसके बाद इसके बारे में टीचर्स से चर्चा कर लें।

24 प्रतिशत परिवारों में हैं स्मार्ट फोन

ऑनलाइन क्लासेस के लिए स्मार्ट फोन होना आवश्यक है। लेकिन हमारे देश में केवल 24 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जो कि अपने बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस के लिए स्मार्ट फोन की व्यवस्था कर पा रहे है। मोबाइल की तुलना में ऑनलाइन क्लासेस के लिए लैपटॉप या डेस्कटॉप का होना अधिक अच्छा माना गया है। लेकिन इस मामले में हमारे देश में स्थिति और भी चिंताजनक हैं। केवल 11 प्रतिशत परिवार अपने बच्चों के लिए लैपटॉप और डेस्कटॉप की व्यवस्था कर पा रहे हैं। ा ऐसे में कमजोर आय वर्ग से आने वाले बच्चों के लिए शिक्षा पर लॉकडाउन ही चल रहा है।

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