दिल्ली के चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन की तकनीक से इंदौर के रानी सराय में तोतों का हैबिटेट बचाया जा सकता है
न्यू ऑस्ट्रियन टनल मेथड (NATM I) से बिना पेड़ काटे खुदाई संभव
मेट्रो में 20 साल के अनुभव वाले इंजीनियर का दावा
इंदौर. सुचेन्द्र मिश्रा
मेट्रो में 20 साल तक काम करने का अनुुभव रखने वाले एक इंजीनियर जो कि आठ मेट्रो प्रोजेक्ट्स की प्लानिंग और इंप्लीमेंटेशन से जुड़े रहे हैं , का कहना है कि एलाइनमेंट में बिना कोई बदलाव किए यदि मेट्रो कॉर्पोरेशन चाहे तो रानी सराय स्थित भूमिगत स्टेशन का निर्माण बिना एक भी पेड़ काटे हो सकता है। उन्होंने इस मामले में दिल्ली मेट्रो के चावड़ी बाजार भूमिगत मेट्रो स्टेशन का हवाला दिया है। इस इंजीनियर में मट्रों के भीतर की बहुत सी बातें बताई हैं जिससे पता चलता है कि मामला इंजीनियरिंग का कम और जिद का ज्यादा है। इतना ही नहीं इस इंजीनियर का कहना है कि मेट्रो में कईं बार सत्तारुढ़ दल के नेताओं के कहने पर बदलाव भी किया जाता है और वही ने्ता जब जनता मेट्रो में बदलाव की मांग करती है तो इंजीनियरिंग का हवाला देकर उन्हें चुप कर देते हैं।

चावड़ी बाजार के स्टेशन के बारे में जानकारी देते हुए इस इंजीनियर ने बताया कि दिल्ली का चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन एक इंजीनियरिंग लैंडमार्क है। येलो लाइन पर स्थित यह स्टेशन सतह से करीब 25 मीटर (82 फीट) नीचे बना है और प्लेटफॉर्म लगभग 21 मीटर की गहराई पर हैं। अजमेरी गेट रोड/हौज क़ाज़ी इलाके की घनी बसावट में इसे पारंपरिक ओपन-कट बॉक्स की बजाय विस्तृत ट्विन-टनल/स्टेशन कैवर्न के अंदर बनाया गया।
निर्माण में न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) का इस्तेमाल हुआ। हौज क़ाज़ी पर करीब 25 x 40 मीटर का एक्सेस शाफ्ट बनाकर चार समानांतर NATM ड्राइव (प्रत्येक लगभग 10 मीटर व्यास) चलाए गए। स्मूथ ब्लास्टिंग और हाइड्रोलिक एक्सकेवेटर्स की मदद ली गई। पड़ोसी इलाकों के ट्विन रनिंग टनल के लिए स्पेशलाइज्ड रॉक TBM और अर्थ प्रेशर बैलेंसिंग मशीनें (EPBM) तैनात की गईं, जो कठोर क्वार्टज़ाइट स्ट्रेटा से गुज़रीं। स्टेशन के अंदर प्री-फैब्रिकेटेड प्लेटफॉर्म सिस्टम है, जिसे छह क्रॉस-पैसेज जोड़ते हैं और हेवी-ड्यूटी एस्केलेटर सपोर्ट देते हैं।
मुख्य चुनौतियाँ और समाधान
पुरानी दिल्ली की संकरी गलियाँ और सदियों पुरानी ईंट/चिनाई वाली इमारतें (जिनकी नींव मजबूत नहीं थी) ओपन-कट खुदाई को असंभव बनाती थीं। भूमिगत स्ट्रेटा में कठोर अपघर्षक क्वार्टज़ाइट रॉक, ऊँची वाटर टेबल और अज्ञात पुराने कुएँ/तालाब थे। ऐतिहासिक इमारतें सेटलमेंट ज़ोन में थीं, इसलिए प्री-कंस्ट्रक्शन सर्वे और रियल-टाइम मॉनिटरिंग की गई। जब स्थानीय नुकसान हुआ तो DMRC ने प्रभावित परिवारों को अस्थायी आश्रय, भोजन दिया और संपत्तियों का पुनर्निर्माण किया।
इंदौर के रानी सराय में तोतों के हैबिटेट का सवाल
इंदौर मेट्रो के रानी सराय स्टेशन के निर्माण से परिसर के पुराने पेड़ों पर असर पड़ रहा है। ये पेड़ दशकों से हजारों तोतों और अन्य पक्षियों का प्राकृतिक बसेरा हैं। पेड़ों की कटाई और निर्माण गतिविधियों से पक्षियों का हैबिटेट प्रभावित हो रहा है। हाई कोर्ट में भी पेड़ों की चरणबद्ध कटाई और पक्षी विशेषज्ञों की निगरानी संबंधी निर्देश आए हैं।
एक मेट्रो इंजीनियर, जिनके पास मेट्रो क्षेत्र में 20 साल का अनुभव है और जो अब तक आठ प्रोजेक्ट एक्जीक्यूट कर चुके हैं, के अनुसार आमतौर पर मेट्रो कंपनियाँ सॉइल के अलग होने (ग्राउंड सेपरेशन और सेटलमेंट) से बचाव पर जोर देती हैं। लेकिन चावड़ी बाज़ार में अपनाई गई NATM तकनीक हर प्रकार की सॉइल और मिश्रित भूगर्भीय स्थिति (मुलायम मिट्टी से लेकर कठोर रॉक तक) में कारगर है। सतह पर बड़े पैमाने की खुदाई कम करके पेड़ों और उनके नीचे के हैबिटेट पर प्रभाव कम किया जा सकता था। गहरे टनल कैवर्न या हाइब्रिड NATM अप्रोच से ऊपर की हरित आवरण और पक्षियों के बसेरे को बेहतर संरक्षित रखना संभव था।
मुंबई में भी यही तकनीक
इसी NATM तकनीक का इस्तेमाल मुंबई मेट्रो लाइन-3 (कोलाबा-बांद्रा-सीप्ज़) में भी किया गया है। घनी बसावट, संकरी सड़कों और हेरिटेज इलाकों के कारण कई स्टेशन पूरी तरह कट-एंड-कवर नहीं बन सके। हूतात्मा चौक, गिरगाँव, कालबादेवी, ग्रांट रोड, शीतलादेवी, सांताक्रूज और मरोल नाका जैसे स्टेशनों में NATM या हाइब्रिड (NATM + कट-एंड-कवर) पद्धति अपनाई गई। हूतात्मा चौक जैसे हेरिटेज प्रिसिंक्ट में नियंत्रित माइक्रो-ब्लास्टिंग और NATM से सतह पर कम से कम प्रभाव रखा गया। इससे साफ होता है कि यह विधि घनी शहरी बनावट में पेड़ों, सतह की संरचनाओं और प्राकृतिक आवासों को अपेक्षाकृत बचाने में मददगार रही है।
चावड़ी बाज़ार और मुंबई के ये उदाहरण दिखाते हैं कि सही टनलिंग तकनीक चुनने से शहरी मेट्रो परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशील इलाकों—खासकर पुराने पेड़ों और पक्षियों के हैबिटेट—को बेहतर ढंग से संरक्षित किया जा सकता है। रानी सराय जैसे स्थलों पर समय रहते ऐसी विधियों का मूल्यांकन न केवल निर्माण की चुनौतियों को कम करता है, बल्कि शहर के हरित आवरण और वन्यजीव आवासों की रक्षा भी सुनिश्चित करता है।
जिद ज्यादा समस्याएं कम
इस इंजीनिर का कहना है कि आमतौैर पर किसी भी बदलाव के लिए अधिकारी और इंजीनियर तकनीकि शब्दावलियों का उपयोग करते हैं और आमजन इसे जानता नहीं है इसके चलते उसकी सुनवाई नहीं होती। इन लोगों के पास एलाइनमेंट में बदलाव, तकनीकि समस्या और कॉस्ट बढ़ जाने जैसे बहाने होते हैं। कौन सी मेट्रो है जो बिना एलाइनमेंट में बदलाव और निर्धारित लागत के भीतर पूरी हो गई है? लेकिन दिक्कत ये है कि आम जनता इन बातों को जानती नहीं हैं इसका फायदा मेट्रो को मिलता है।
नोट : ये जानकारी मेट्रो इंजीनियर के साथ हुई बातचीत पर आधारित है। इंजीनियर के आग्रह पर पहचान छुपाई गई है।
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