2nd December 2021

सात विदेशी और एक भारतीय हैं ओलंपिक में हमारे पदक विजेताओं के पीछे

जानिए उन कोच के बारे में जो कि महीनों तक हमारे खिलाड़ियों के साथ मेहनत करते रहे

Goonj special

ओलंपिक में पदक जीतने के पीछे खिलाड़ियों की परसों की साधना लगती है लेकिन इसके साथ ही उन्हें योग्य शिक्षकों का मार्गदर्शक भी जरूरी है। टोक्यो ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने एक स्वर्ण दो रजत और चार कांस्य पदक सहित कुल 7 पदक जीते हैं। इन पदक विजेता खिलाड़ियों को हम बहुत अच्छी तरह से जान गए हैं यहां तक की इन खिलाड़ियों के परिवारजनों के बारे में भी हमारे पास बहुत सारी जानकारी है। लेकिन इनकी कुछ की बात करें तो हॉकी इनके कोच के अलावा अन्य किसी के बारे में उतनी जानकारी नहीं है।

उवे हॉन, डॉ. क्लास बर्टोनित्ज और नीरज चोपड़ा

सबसे पहले जानते हैं स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा के कोच जर्मनी के उवे हॉन और बायोमैकेनिकल एक्सपर्ट डॉ. क्लास बर्टोनित्ज हैं। खास बात यह है कि एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद नीरज चोपड़ा ने एथलेटिक्स फेडरेशन से होन के साथ कोचिंग करने से मना कर दिया था। हॉन जैवलिन थ्रो के माहिर खिलाड़ी रहे हैं। वे ऐसे इकलौते जैवलिन थ्रोअर रहे हैं जिसने 104 मीटर तक भाला फेंका है। हालांकि उनका यह रिकॉर्ड 1986 के पहले का है उसके बाद जेवलिन में इतने बदलाव कर दिए गए हैं कि अब इतनी दूर तक भाला फेंकना संभव नहीं है।

खास बात यह है कि हॉन एक साथ कई खिलाड़ियों को ट्रेन करते हैं जिसके चलते भारतीय खिलाड़ियों को उनके साथ तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। वे और बायोमैकेनिकल एक्सपर्ट क्लास बर्टोनित्ज एक साथ काम करते हैं। बाद में एथलेटिक्स फेडरेशन ने हॉन के अलावा बर्टोनित्ज की भी सेवाएं ली और नीरज चोपड़ा को बर्टोनित्ज ने ही हैंडल किया।
टोक्यो ओलंपिक खेलों में भी ऑस्ट्रेलिया की एक महिला भाला फेंक खिलाड़ी को भी इन दोनों ने ट्रेन किया था हालांकि उस खिलाड़ी का प्रदर्शन ओलंपिक में कुछ खास नहीं रहा। ये दोनो इसके पहले चीनी खिलाड़ियों के साथ भी काम कर चुके हैं।
जैवलिन थ्रो के बारे में बर्टोनित्ज का कथन याद रखने लायक है उनका कहना है कि जैवलिन थ्रो वर्तमान की तरह होता है और भाला तीर की तरह।

विजय शर्मा और मीरा बाई चानू

विजय शर्मा भारतीय पदक विजेताओं के प्रशिक्षकों में अकेले भारतीय हैं। लंबे समय से मीराबाई चानू को ट्रेन कर रहे हैं। 2016 में जब रियो ओलंपिक में मीरा एक भी वैलिड लिफ्ट नहीं कर पाई थी और डिप्रेशन में चली गई थी उस समय मीरा की मां के अलावा विजय शर्मा ही थे जिन्होंने उसे इन परिस्थितियों से बाहर आने में मदद की। मीरा और विजय शर्मा का तालमेल ही है जिसके चलते मीरा ने न केवल विश्व रिकॉर्ड बनाया बल्कि ओलंपिक में रजत पदक भी जीता है।

विजय शर्मा स्वयं वेटलिफ्टर थे लेकिन कलाई की चोट के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा। बाद में वे कोचिंग में आ गए और उनके प्रशिक्षण में उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता जीती थी उसके बाद से वेटलिफ्टिंग फेडरेशन ने शर्मा को राष्ट्रीय कोच नियुक्त किया था।

कमाल मालिकोव, रवि कुमार के कोच

57 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में रजत पदक जीतने वाले रवि कुमार दहिया के कोच का नाम कमाल मालिकोव है। वह रसिया के दागिस्तान से आते हैं। दागिस्तान दुनिया में कुश्ती का गढ़ माना जाता है। इस ओलंपिक में भी सबसे ज्यादा पदक यहीं के पहलवानों ने जीते हैं। रवि कुमार फाइनल में जिस पहलवान से हारे वो भी यहीं का है।

उन्हें दो ओलंपिक खेलों में पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार की ओलंपिक क्वालीफिकेशन की तैयारी के लिए लाया गया था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इसके बाद मालिकोव को अप्रैल 2021 से टॉप्स स्कीम के अंतर्गत रवि कुमार दहिया को ट्रेन करने के लिए लगाया गया।

जब दहिया विश्व कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल में हारे थे तो उसके बाद मालिकों ने उनके रिएक्शन टाइम और काउंटर करने की स्पीड पर काम किया जिसके चलते रवि कुमार ने ओलंपिक में फाइनल तक का सफर तय किया। मलिकोव फिटनेस ट्रेनर हैं। खिलाड़ियों के साथ बहुत जुड़कर काम करते हैं यही कारण है कि सुशील कुमार ओलंपिक्स में एक रजत और एक कांस्य पदक जीत सके थे। माना जा रहा है कि रवि कुमार के साथ वे अगले ओलंपिक तक रहेंगे।

शेको बेंटिनिडिस, बजरंग पूनिया के कोच

यह ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने पहलवान बजरंग पूनिया के कोच हैं। मूल रूप से जॉर्जिया निवासी बेंटिनिडिस के साथ बजरंग पूनिया की तैयारी को देखते हुए स्वर्ण पदक की उम्मीद थी लेकिन बजरंग की चोट के चलते ऐसा नहीं हो सका। बेंटिनिडिस ने बजरंग की लेग डिफेंस को ठीक करने के लिए उन्हें अपने साथ कईं देशों की यात्रा कराई थी।

बजरंग पूनिया के खेल में उनकी लेग डिफेंस को सबसे कमजोर माना जाता है। इसमें सुधार हुआ है लेकिन बेंटिनिडिस के अनुसार इसमें और सुधार की गुंजाईश है। खास बात ये है कि जब बजरंग अपना कांस्य पदक का मुकाबला जीते उस समय बजरंग ने तो अपने भगवान को याद किया ही बेंटिनिडिस भी ईसाई तौर तरीकों से अपने भगवान को याद करते देखे गए थे।

राफेल बर्गमास्को, लवलीना बोरगोहेन के कोच

राफेल बर्गमास्को इटली से आते हैं और उनके पिता ओलंपियन थे। वे इसके पहले इटली की महिला बॉक्सिंग टीम के कोच रह चुके हैं। वे इसके बाद वहां की पुरुष टीम के भी कोच रहे हैं। इस दौरान इटली के महिला व पुरुष बॉक्सर्स ने ओलंपिक में छह पदक जीते हैं। लेकिन रियो ओलंपिक में इटली के बॉक्सर कोई पदक नहीं जीत सके इसके बाद उन्हें हटा दिया गया था।

इसके बर्गमास्को 2017 में भारत आए। पहले उन्हें जूनियर टीम के साथ काम करने को कहा गया था। उनके प्रशिक्षण में भारतीय मुक्केबाजों ने विश्व यूथ बॉक्सिंग चैंपियनशिप में अब तक का सर्वश्रेष्ठ करते हुए पांच स्वर्ण और दो कांस्य पदक जीते थे। इसके बाद उन्हें भारतीय महिला मुक्केबाजी टीम का हाई परफार्मेंस डायरेक्टर बना दिया गया था। वे तब से लवलीन बोरगोहेन के साथ काम कर रहे हैं।

पार्क ताए सैंग सिंधु के कोच

कोरियन कोच पार्क को सायना नेहवाल को ट्रेन करने के लिए लाया गया था। लेकिन कोरोना के चलते क्वलीफायर्स नहीं हुए इसके चलते उन्हें ओलंपिक में जाने का मौका नहीं मिला । ऐसे में पार्क की सेवाएं पीवी सिंधु को दे दी गईं। सिंधु अपने रैकेट के रफ्तार और पॉवर हिटिंग के लिए जानी जाती हैं लेकिन उनके खेल में विविधता की कमी महसूस की जा रही थी।

इसी के लिए पार्क ताए सैंग को सिंधु के साथ जोड़ा गया था। वे अपने कोर्ट के मूवमेंट के लिए दुनिया में पहचाने जाने वाली कोरियल बैडमिंटन खिलाड़ी सुंग ह्यूंग के साथ काम कर चुके हैं। पार्क ने सिंधु की डिफेंस पर विशेष काम किया। इसके साथ ही सिंधु के नेट पर खेल में भी सुधार की जरूरत थी। इस पर भी पार्क ताए सैंग ने काम किया। सिंधु को इसका फायदा ओलंपिक में क्वार्टर फाइनल में अपनी जापानी प्रतिद्वंदी के खिलाफ मिला। यहीं कारण है कि वो इस बार मैडल जीत सकीं।

ग्राहम रीड , 41 साल का सूखा खत्म किया

ग्राहम रीड ऑस्ट्रेलियाई हैं और 2016 के ओलंपिक खेलों में ऑस्ट्रेलियाई पुरुष हॉकी टीम के कोच थे। टीम क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड के हाथों 4-0 से हार गई और रीड की छुट्‌टी हो गई। उसके कुछ समय बाद वे भारतीय टीम से जुड़ गए। उन्होंने भारचीय हॉकी टीम में सबसे पहले मनोवैज्ञानिक स्तर पर काम किया। टीम की असमय बड़ी गलती करने की आदत को कम करना जिसका कि उसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता था।

टीम की ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के हाथों 7-1 की हार के बाद टीम का मनोबल बनाए रखने के लिए भी उन्होंने बहुत कोशिश की। उन्होंने इस हार के बाद टीम के खिलाड़ियों को मैच दर मैच अपना फोकस करने को कहा। आज ग्राहम रीड 41 साल बाद ओलंपिक में मेडल जीतने वाली हॉकी टीम के साथ ही हमारे देश के खेल इतिहास में दर्ज हो गए हैं। हालांकि फिलहाल को महिला हॉकी टीम के कोच सोर्न मरिजने देश में उनसे ज्यादा लोकप्रिय हैं लेकिन रीड के योगदान को भारतीय हॉकी कभी भुला नहीं सकेगी।

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